निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३१ ) ७ अ० २पा०१ खं०
देवताओं के नाम आते हैं, उतने ही अलग २ देवता हो
सकते हैं, न एक और न तीन। क्योंकि स्तुतियाँ अलग २ हैं।
वैसे ही नाम ( भी अलग २ हैं ) ।
“यथो एतत्०” जो कि यह (कहा है-) 'कर्म के भेद से
( नामों का भेद है, किन्तु वस्तु (देवता के भेद से नहीं ? )
यह । (वह ठीक नहीं, क्योंकि-) बहुत (मनुष्य) भी विभाग
करके (अलग २ होकर या बांटकर ) कर्मों को (अलग २
क्रियाओं को) कर सकते हैं ।
“तत्र०” उस (भेद पक्ष देवतानानात्वपक्ष ) में संस्थान
की एकता और संभोग की एकता देखना चाहिये-दूसरे (या-
ज्ञिक या आत्मवित् ) जो एकता मानते हैं, वह गौण बुद्धि
से है, किन्तु वास्तवमें नहीं, और वह (गौण एकता) स्थान की
एकता से तथा भोग की एकता से लेना चाहिए। जैसे-पृथिवी
( स्थान ) में मनुष्य, पशु, और देवता हैं, इनका एक स्थान
और एक संभोग है-खान पान निद्रा मैथुन आदि सब समान
है, ऐसा देखा जाता है, (इस से 'पृथिवी' के कहने से ये
सब समझ लिये जाते हैं, - पृथिवी ऐसा करती है, पृथिवी ऐसा
मानती है)। जैसे पृथिवी को पर्जन्य (मध्यम देव इन्द्र) से
और वायु आदित्य दोनों से संभोग है, और दूसरे (अन्तरिक्ष
या द्यु ) लोक को अग्नि से (संभोग है)।
( दोनों पक्षों को समान दृष्टान्त )
“तत्र एतत् नरराष्ट्रमिव” उन (एक के अनेक नाम
मानने वालों और अनेकों के अनेक नाम मानने वालों ) में
“नर-राष्ट्र के समान” यह है अर्थात्-एक ही नर