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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 797, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 797

हिन्दी निरुक्त ( २५ ) ७ अ० १ पा० ५ खं०
(निरु०-) प्रत्यक्षदृश्यम् एतद् भवति ।
यह प्रत्यक्ष से देखने योग्य है-प्रत्यक्ष ही देखा जाता है-
जैसे कि- मनुष्यों के घोड़े आदि साधन अनित्य (असमर्थ) हैं
वैसे ही देवताओं के भी होंगे ।
“यत्काम ऋषिः” इस देवता के लक्षण की अश्व
आदि प्राणियों में तथा अक्ष आदि द्रव्यमात्रों में जो अव्याप्ति
( अगति ) दिखाई है, उसका परिहार-
(निरु०-) माहाभाग्याद् देवताया एक आत्मा
बहुधा स्तूयते ।
देवता के माहाभाग्य- अलौकिक सामर्थ्य से एक आत्मा
बहुत प्रकार से स्तुति किया जाता है- देवता में बड़ा ऐश्वर्य
रहता है, वह अपने ऐश्वर्य ( चमत्कारशक्ति ) से अपने
संकल्प के अनुसार जड रूप से तथा चेतन रूप से अनेक प्रकार
से हो जाता है, कोई ऐसी बात नहीं है, जिसे देवता न कर
सके, सुतराम् देवता अश्वरूप हो या अक्षरूप हो, जड रूप
हों, या चेतन रूप हो, सब रूपों में उसकी शक्ति वैसी ही
बनी रहती है, उसके सब वे इच्छामय रूप है, वास्तव में वह
पशु या जड़ नहीं है, इस से सब अवस्थाओं में वह स्तोता
की स्तुति को सुन सकता है, समझता है और उसके वाञ्छित
को पूरा कर सकता है, किसी प्रकार भी देवतालक्षण की उस
में असंमति नहीं है ।
पूर्व वाक्य में देवता लक्षण में व्याप्ति दोष का परिहार
किया है, किन्तु वेदान्तों के मत में एक आत्मा (देवता) और
नैरुक्तों के मत में तीन आत्मा या अग्नि, इन्द्र और सूर्य तीन

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