निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदेवता के अधिकार में अध्ययन पाठ (संहिता पाठ) में
देवता के लिङ्ग से रहित मन्त्र पढा गया हो, उसी देवता का
वह मन्त्र होता है।
(ख) अथवा 'प्रायः' यह बाहुल्य का नाम है। इस से
अनादिष्ट दैवत मन्त्र बहुत देवताओं का होता है- जितने
देवता हैं, सभी उसके देवता हैं और वे 'विश्व देवता' इस
नामसे कहे जाते हैं।
लोकाचार का दृष्टान्त-
(निरु०- ) अस्ति हि आचारो बहुलं लोके
देवदैवत्यम्, अतिथिदैवत्यम्, पितृदैवत्यम् ॥
क्योंकि-लोकमें बहुत आचार (रीति) है,- देवदैवत्य,
अतिथिदैवत्य, पितृदैवत्य- विशेष विशेष नामों से बढे हुये
द्रव्य से जो बच जाता है, वह साधारण (सब का यों साझैँ
का) हो जाता है। जैसे कोई यजमान कहता है- 'यह मेरा
द्रव्य देवदेवताओं के लिये है' 'यह मेरा अतिथिदेवताओं
के लिये है, 'यह मेरा पितृदेवताओं के लिये है' ऐसा विभाग
करदेने पर जो द्रव्य उस दानार्थ नियत की हुई राशि से बच
जाता है, वह देव पितर और मनुष्य सब के साझ का हो
जाता है, वैसे ही जिन मन्त्रों के देवताओं का निर्देश (लिङ्ग
आदि से सूचना) किया हुआ है, उनसे अलग रहे हुये जो
मन्त्र हैं, वे सब देवताओं के होते हैं।
इस विचार में यास्क आचार्य का क्या निश्चय है ?
(निरु० ) याज्ञदैवतो मन्त्रः-इति ॥
जो अप्रकट देवतालिङ्ग वाला मन्त्र है, वह यज्ञ देवता
का है, अथवा दैवत = अग्नि देवता का है।