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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 791

हिन्दी निरुक्त ( १६ ) ७ अ० १ पा० ४ खं०
संयुक्त इस सूक्त को देखा था, वही इसकी ऋषिका है। उस
सूक्त में यह त्रिष्टुप् छन्द है। दाता की प्रशंसा है।
भोज या दानशील राजा का यह घर पुष्करिणी (कम-
लों से सजी हुई तलाई या विमान) के समान (सुन्दर) है।
ऐसे ही और २ मन्त्रों में भी निन्दा और प्रशंसा:-
(निरु०) एवम् अक्षसूक्ते द्यूतनिन्दा च कृषि-
प्रशंसा च ॥
इसी प्रकार अक्षसूक्त में द्यूत (जूवा) की निन्दा और
कृषि की प्रशंसा है। जैसे- "अक्षैर्मादीव्यः" पाशों से मत
खेल। "कृषिमित्कृषस्व" कृषिका ही कर्षणा कर (खेती
ही कर) (ऋ० सं० ७, ८, ५, ३) ॥
ऋषि किसी कारण से मन्त्रों के देखने वाले ही होते हैं
किन्तु कर्त्ता नहीं होते-
(निरु०- एवम्--उच्चावचैः अभिप्रायैः ऋषीणां
मन्त्रदृष्टयो भवन्ति ॥
इस (पूर्वोक्त) प्रकार से ऊँचे नीचे अभिप्रायों से
ऋषियों को मन्त्रों के दर्शन होते हैं ॥
(खं० ४)
जिन मन्त्रों में "यत्काम ऋषिः०" (७,१,१) इत्यादि
पूर्वोक्त मन्त्रदेवतात्मा लक्षण नहीं घटता, उनमें देवता निर्णय
करने की प्रतिज्ञा-