निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १४ ) ७ अ० १ पा० ३ खं०
(निरु०-) अथापि स्तुतिरेव भवति न
आशीर्वादः ।
और कोई मन्त्रों में स्तुति ही है, किन्तु आशीर्वाद या
किसी अर्थ की कामना नहीं ।
उदाहरण-
[ निरु०- ] “ इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचम् ”
इति यथा एतस्मिन् सूक्ते ( ऋ०सं० १,७,२,१) ॥
“इन्द्रस्य नु वीर्याणि०” यह पन्दरह ( १५ ) ऋचाओं
का दूसरा सूक्त है । आङ्गिरस हिरण्यस्तूप ऋषि त्रिष्टुप् छन्द,
इन्द्र देवता और अग्निष्टोम में माध्यन्दिन सवनमें निष्केवल्य
शस्त्र में विनियोग है ।
( अहम् ) मैं ‘इन्द्रस्य’ इन्द्रके ‘ वीर्याणि ’ पराक्रम-युक्त
कर्मों को ‘नु’ शीघ्र ‘प्रवोचम्’ ( ब्रवीमि ) कहता हूं ।
दूसरा विशेष—
[निरु०-] अथापि आशीरेव न स्तुतिः ।
कुछ मन्त्रों में कामना ही है किन्तु स्तुति नहीं ।
उदाहरण-
(निरु०-) “सुचक्षा अहमक्षीभ्यां भूयासम्, सु-
वर्चा मुखेन सुश्रुत्कर्णाभ्यां भूयासम्” इति ।
प्रजापति ऋषि, यजुः, सविता देवता, और नेत्र के अभि-
मन्त्रण में विनियोग है । (पा०गृ०जयरा०भा०)
हे सवितृदेव ! ‘अहम्’ मैं ‘अक्षीभ्याम्’ (नेत्राभ्याम्) नेत्रों
से ‘सुचक्षाः’ सुन्दर दर्शन शक्ति वाला ‘भूयासम्’ हो जाऊं ।