निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (१०) ७ अ० १ पा० २ खं०
इन्द्र !' हे इन्द्र 'नः' हमारे (एतान्) इन 'मृधः' युद्ध करने
वाले शत्रुओं को 'विजहि' नाश कर ।
जहां स्तुति करने वाले (ऋत्विज्) प्रत्यक्ष हैं और
देवता परोक्ष, ऐसी ऋचाओं की सम्भावना-
(निरु०) अथापि प्रत्यक्षकृताः स्तोतारो भवन्ति
परोक्षकृतानि स्तोतव्यानि ।
और भी स्तोता (स्तुति करने वाले) 'त्वम्' आदि पद से
कहे जाने के कारण प्रत्यक्ष होते हैं और स्तोतव्य देवता
परोक्ष ।
उदाहरण-
[निरु०] “माचिदन्यद्विशंसत” [ऋ० सं० ५,
७, १०, १)
इस ऋचा का प्रगाथ ऋषि, बृहती छन्द और तृच अशी-
तिओं में विनियोग है।
हे (स्तोतारः !) स्तुति करने वालो ! (यूयम्) तुम 'अन्यद्
दूसरे किसी देवता को 'मा' मत 'विशंसत' विविध स्तुतियों
से स्तुति करो। यहां स्तोता “यूयम्” और “विशंसत”
इस क्रिया पद से उक्त हैं, इस से प्रत्यक्ष हैं, और देवता
परोक्ष पद का वाच्य है।
दूसरा उदाहरण-
[निरु०] “कण्वा अभिप्रगायत” [ऋ०सं०१,३,
१२, १]
इस ऋचा का कण्व ऋषि है। त्रैलीन हविष की याज्या