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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 750, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 750

हिन्दी निरुक्त ( ३३७ ) ६ अ० ६ पा० २ खंड०
‘ अरायि ! ’ सम्बोधन दियागया है । ) हे ‘ काणे ! ’, मन्द
नेत्र वाली ! [ क्योंकि-दुर्भिक्षसे पीडित जनों की दृष्टि मन्द
हो जाती है । ] ( अलक्ष्मी के पक्षमें भी काणी अलक्ष्मी प्रतीत
होती है । क्योंकि = लोकमें भी विरूप स्त्री को अलक्ष्मी कहते
हैं ।) हे ‘विकटे !’ विकट गति वाली ! [ क्योंकि-दुर्भिक्ष से
दुर्बल हुए प्राणियों की गति विकट होजाती है । ] [ अलक्ष्मी
पक्षमें वह विकट-रूपा प्रतीत होती है । ] ‘सदान्वे ²’-सदा
नोनुवे ? -सदा प्राणियों को रुलाने वाली ? (क्योंकि-दुर्भिक्ष
में भूख के मारे पीडित प्राणी हैंकते हुए सदा शब्द करते हैं ।
तू ‘ गिरिंगच्छ ’ पहाड़ पर चली जा । “ शिरिम्बिठस्य
( मेघस्य ) तैः सत्वाभिः (उदकैः) त्वा चातयामासि
( नाशयामः ) मेघ के उन जलों से तुझे हम नाश करते
हैं । अथवा “ शिरिम्बिठस्य (भारद्वाजस्य) सत्वाभिः
नामभिः तेभिः त्वा चातयामासि ” भारद्वाज ऋषि के
देखे हुए स्तुतियुक्त नामों से हम तुझे नाश करते हैं । इस
प्रकार यहां ‘ सदान्वे ’ पद ‘ सदानोनुवे ’, ( शब्द कराने
वाली ! ) के अर्थ में है ।
इस मन्त्र में ‘अरायि’ ( १ ) ‘काणे’ ( २ ) ‘विकटे’ ( ३ )
‘सदान्वे’ ( ४ ) स्त्री लिङ्ग सम्बोधन पद हैं । उनमें पहिला
‘अरायि’ पद दानार्थक ‘रा’ (अदा०प०) धातुका ‘णिन्’ प्रत्यय
के संयोगसे ‘रायि’ होता है । जैसे दानार्थक ‘ दा ’ (जु०उ०)
धातु का ‘ दायि ’ होता है । उसी का निषेध ‘ अरायि ’
है, जिसका लोक में स्त्रीलिङ्ग रूप ‘अरायिनी’ और सम्बोधन
में उसी का ‘ अरायिनि ’ तथा ‘ दा ’ धातु का उसी प्रकार