निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमाश्रिताः सूर्य मुपतिष्ठन्ते ।
अपिवा उपमार्थे स्यात्। सूर्यमिवइन्द्रम्-उपति-
ष्ठन्ते-इति । सर्वाणि इन्द्रस्य धनानि विभक्षमा-
णाः । सयथा धनानि विभजति, जाते च जनिष्य-
माणे च । तं वयं भागम्-अनुध्यायाम ओजसो
बलेन ।
'ओजः' ओजतेर्वा । उब्जतेर्वा ॥
'आशीः' आश्रयणाद् वा । आश्रपणाद् वा ॥
अथ-इयम्-इतरा 'आशीः' आशास्तेः ॥
“ इन्द्राय गाव आशिरम् ” (ऋ० सं० ६, ५,
६, १) इत्यपि निगमो भवति ॥
“सामे सत्याशीर्देवेषु” इति च ॥ ४ ॥
'आयन्तः' ३४) मन्त्रगत 'समाश्रिताः' (किसी में रहे हुए) के अर्थ में है ।
अर्थः-“श्रायन्तइव” इस ऋचाका बृहती छन्द है सुमेध
आङ्गिरस ऋषि है । महाव्रतमें बृहती सहस्त्रमें विनियोग है ।
प्रथम पक्षमें-'इव' (अनर्थक है ) (रश्मयः) रश्मिएं 'आ-
यन्तः' (समाश्रिताः) सब प्रकार आश्रित हुये हुये 'सूर्यम्' सूर्य
की ( उपतिष्ठन्ते ) उपस्थान करते हैं । (अपिवा) दूसरे पक्ष में
'इव' उपमा अर्थ में है । अर्थात्-'सूर्यम्-इव' सूर्य को जैसे,
( इन्द्रम् उपतिष्ठन्ते ) इन्द्र को उपस्थान करते हैं । कैसे ?
“विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत” 'इत्' (अनर्थक) सूर्य के 'विश्वा'
(विश्वानि) सब 'वसूनि' धनों को ' इन्द्रस्य' इन्द्रकी 'भक्षत'