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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 669, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 669

हिन्दी निरुक्त ( ३५५ ) ६ अ० २ पा० ३ खं०
‘नासत्या’ (नासत्यौ) हे अश्विनौ ! (युवाम् ) तुम दोनों स-
जोषाः' मेरे साथ प्रीति करते हुए या आपस में प्रीति करते
हुए ‘अस्मे’ (अस्मान् ) (प्रति) मेरे पास ‘आ-यातम्’ आओ।
यहां ‘अस्मे’ का ‘अस्मान्’ द्वितीयान्त का अर्थ है।
(३ या-) “अस्मे समानेभिर्वृषभ पौंस्येभिः”
‘वृषभ’ हे कामों के बरसने वाले इन्द्र देव ! ‘समानेभिः’ (स-
मानैः) समान ‘पौंस्येभिः’ बल वालों ‘अस्मे’ (अस्माभिः) हम
मरुतों के साथ ही [ तुमने बहुत कर्म किये हैं।] [ यहां
‘समानेभिः’ ‘पौंस्येभिः’ इन पदों के साथ सम्बन्ध होने के
कारण ‘अस्मे’ यह ‘अस्माभिः’ (हमसे) तृतीया के अर्थ में है।]
(४ चौं ) “अस्मे प्रयन्धि मघवन्नृजीषिन्”
‘मघवन्’ हे इन्द्र ! ‘ऋजीषिन्’ ऋजीष (सोम के सूखस) वाले !
‘अस्मे’ (अस्मभ्यम् ) हमारे अर्थ ‘प्रयन्धि’ (देहि ) धन दे।
यहां दान के सम्बन्ध से ‘अस्मे’ यह ‘अस्मभ्यम्’ (हमारे लिये)
के अर्थ में है ॥
(५ मी-) “अस्मे आराच्चिद् द्वेषः सनुतर्युयोतु”
(इन्द्र.) इन्द्रदेव ‘अस्मे’ (अस्मत) हम से ‘आराच्चित्’ दूर कहीं
ले जाकर ‘सनुतः’ हमसे परोक्ष ‘द्वेषः’ पाप को ‘युयोतु’ (नाश-
यतु) नाश करे। यहां ‘आरात्’ (दूर ) पद के योग से ‘अस्मे’
(अस्मत् यह पञ्चमी के अर्थ में है।
(६ ष्ठी-) “ऊर्व इव पप्रथे कामो अस्मे” हे इन्द्र!
‘अस्मे’ (अस्माकम् ) हमारा ‘कामः’ काम या मनोरथ ‘ऊर्वः-इव’
बड़वानल अग्नि के समान ‘पप्रथे’ (प्रथते) बढता है, या बढ़े।
यहां ‘कामः’ पद के साथ सम्बन्ध होने के कारण ‘अस्मे’ यह
‘अस्माकम्’ (हमारा) के अर्थ में षष्ठी का रूप है।