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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 661, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 661

हिन्दी निरुक्त ( २४६ ) ६ अ० १ पा० ५ खं०
“मोषथा वृक्षं कपनेव वेधसः” अर्थात्-हे मरुतो !
तुम 'कपनाः' कँपाने वाले 'वेधसः' वेधने वाले कीड़े 'वृक्षम्-इव'
वृक्षको जैसे 'मोषथा' ( मोषथ ) ( मेघको ) भेदन करो, । यह
भी निगम है।
'भ्राजृजीकः ( १६ ) ( अनवगत ) 'प्रसिद्धभाः' (प्रसिद्ध
कान्तिवाले ) के अर्थ में है ।
“धूमकेतुः समिधा भ्राजृजीकः” अर्थात्-हे अग्नि
देव ! तू 'धूमकेतुः ' धूम से जाना जाता या धूमरूप केतु
(ध्वजा ) वाला है, 'समिधा' धमाने से 'भा ऋजीकः' चमकने
वाला है। यह भी निगम होता है।
'रुजानाः' ( २० ) (अनवगत) है । 'रुजान, क्या ? नदी
होती हैं। क्यों ? वे कूलों (तटों) को रुजन (भंग) करती हैं।
“संरुजानाः पिपिष इन्द्रशत्रुः” अर्थात्-' इन्द्रशत्रुः '
इन्द्र का शातयितव्य ( वध्य ) मेघ ' संरुजानाः ' नदियों के
प्रति 'पिपिषे' चूर्ण होगया, । यह भी निगम होता है ॥
' जूर्णिः' ( २१ ) ( अनवगत ) अथवा हिंसार्थक ' ज्र '
( भ्वा०प० ) धातुसे है। अथवा गत्यर्थक 'द्रू' (भ्वा० प० )
धातुसे है। अथवा हिंसार्थक 'द्रू' ( स्वा० प० ) धातु से है ।
“क्षिप्ता जूर्णि र्न वक्षाति” अर्थात्-'क्षिप्ता' राक्षसों की
फेंकी हुई 'जूर्णिः' शक्ति ( अस्त्रविशेष ) 'न-वक्षति' हमारे
ऊपर न आवेगी, । यह भी निगम होता है ॥
' ओमना ' ( २२ (अनवगत ) ('अवनाय' ) रक्षा या
तृप्ति के लिये के अर्थ में ) है।
“परिद्युम्नोमना यां - वयोऽगात् ” अर्थात्-हे