निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ९७ ) ४ अ० ४ पा० ६ खं०
अर्थात् “ ‘षलरे’ (षडरे) छः अरों वाले संवत्सरचक्र में आदित्य
को ‘अर्पितम् ’ आश्रित ‘आहुः’ कोई ब्राह्मण ग्रन्थ कहते हैं”
इस में संवत्सर में छः ऋतु कहे हैं । ‘अर’ क्यों ? नाभि या
पहिए के मध्य काष्ठ में प्रत्यूत (आश्रित) हैं । और ‘षष्’ ‘सह’
(भ्वा० आ० ) धातुसे है ।
“द्वादशारं नहि तज्जराय” [ऋ०सं० २, ३, १६, १]
अर्थात् ‘द्वादशारम्’ बारह अरों वाला ‘तत्’ वह संवत्सर चक्र
‘जराय’ जीर्ण ‘न’ नहीं होता ।
“द्वादश प्रधयश्चक्रमेकम्” [ऋ० सं० २, ३, २३, २]
अर्थात्–‘द्वादश’ बारह ‘प्रधयः’ प्रधि (गण्डपुच्छ) या मिलकर
चक्रमें लगे हुए काष्ठ ‘एकम्’ एक ‘चक्रम्’ चक्र होता है । ये
दोनों ऋचाओंके पाद् संवत्सर के बारह मासोंका वर्णन करते
हैं । ‘मासाः’ मास क्यों? कालका मान करते हैं । ‘प्रधि’ क्यों?
प्रहित या मिलकर रहता है ।
“तस्मिन् साकम्” ०—० [ऋ० सं० २, ३, २३, २]
अर्थात् “ ‘तस्मिन्’ उस संवत्सर रूप चक्रमें ‘साकम्’ मिलकर
(रात्रि और दिन ) ‘ त्रिशता ’ ( त्रीणि शतानि ) तीन सौ
(३००) ‘न’ और ‘षष्टिः’ साठ (६०) अहोरात्र (दिन) ‘शङ्कवः’
कीले ‘न’ जैसे ‘अर्पिताः’ ठुके हुए हैं । ‘ लाचलासः’ (चलानि
अचलानि च ) जो निरन्तर चलने वाले होनेसे चल और अपने
स्वरूप को न छोड़ने वाले होनेसे अचल हैं”। यह ऋचा और-
“षष्टिश्च” ०—० [ब्रा०] अर्थात्–“साठ और तीन सौ
संवत्सर के अहोरात्र ( रात दिन ) हैं । ” यह ब्राह्मण रात्रि
‘और दिनको एक करके संवत्सरके दिनोंको वर्णन करता है ।
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