निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४५ ) ४ अ० २ पा० ३ खं०
लञ्छन से। (क्योंकि- लक्ष्मीवान् उससे लञ्छित जैसा हो जाता
है।) अथवा प्रेप्सा (बड़ी लालसा) अर्थमें 'लष' (भ्वा०प०)
धातु से हो। क्योंकि- सभी उसे बहुत चाहते हैं।) अथवा
आश्लेष (चपकना) अर्थ में 'लग' (स्वा० प०) धातु से है।
(क्योंकि- वह पुरुष के साथ लगी हुई जैसी होती है॥)
'शिप्रे' (११) इसकी आगे व्याख्या करेंगे॥ ३ (१०)॥
१ (३ खं०)
[निरु०] "तत्सूर्य्यस्य देवत्वं तन्महित्वं मध्या
कर्त्तोर्विततं सञ्जभार। यदेदयुक्तं हरितः सध-
स्थादाद्रात्री वासस्तनुते सिमस्मै॥"
(ऋ० सं० १, ८, ७, ४,)
(भा०) तत्सूर्य्यस्य देवत्वं तन्महित्वं, मध्ये
यत्कर्मणां क्रियमाणानां विततं संह्रियते। यदा-
असौ-अयुक्त हरणान् आदित्यरश्मीन्। हरितः
अश्वान्-इतिवा। अथ रात्री वासस्तनुते सिमस्मै।
वेसरम् अहः-अवयुवती सर्वस्मात्। अपिवा उप-
मार्थे स्यात्-'रात्री-इव वासस्तनुते' इति। तथापि
निगमो भवति। "पुनः समव्यद् विततं वयन्ती"
[ऋ० सं० २, ८, २, ४, ]।
(भा०) समनात्सीत्॥ ३ (११)
१ "तत्सूर्य्यस्य देवत्वम्" इति आङ्गिरसस्य कुत्सस्य
इयमार्षम् त्रिष्टुप् छन्दः। सौर्य्यस्य पशोः षडर्चे वपाया याज्या