निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४१ ) ४ अ० १ पा० ८ सं०
मनुष्वधं मदाय । आसिञ्च स्वजठरे मध्वऊर्मिं त्वं
राजासि प्रदिवः सुतानाम् ॥
( ऋ० सं० ३, ३, ११, १ )
( भा० ) “ मरुत्वानिन्द्र ” मरुद्भिस्तद्वान् ।
'वृषभः' वर्षिता अपाम् 'रणाय' रमणीयाय
संग्रामाय । पिब सोमम् अनुष्वधम् अन्वन्नम् 'मदाय'
मदनीयाय जैत्राय । आसिञ्चस्वजठरे मधुनः
ऊर्मिम् । 'मधु' सोमम्-इतिऔपमिकम् । माद्यतेः।
इदमपि इतरत् मधु एतस्मादेव । त्वंराजासि पूर्वेषु
अपि अहःसु सुतानाम् ॥८॥
इति चतुर्थाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥४,१॥
अनुवादः ।
मन्त्रार्थ व निरुक्तार्थ ।— हे ' इन्द्र ! ' जोतू मरुत्वान्
मरुतों ( वायुओं ) से उन वाला ( मरुतों वाला ) या उनका
स्वामी [ कहलाता है ] 'वृषभः' जलों का वर्षने वाला है,
रण या रमण के देने वाले संग्राम के उद्देश्य से ' मदाय '
मदनीय या हर्ष-दायक या ' जैत्र ' जय-दायक मद के अर्थ
' सोमम् ' सोम रस को ' अनुष्वधम् ' अन्न खा-खाकर 'पिब'
पी । [ कम नहीं, बल कि ] ' स्वजठरे ' अपने पेट में 'मधुनः'
सोम की ' ऊर्मिम् ' लहरी को ' आसिञ्च ' खूब सींच ।
'मधु' सोम का औपमिक ( उपमा से ) नाम है । [अर्थात्
मद्य के समान मद का देने वाला है । ] हर्ष अर्थ में ' मद् '
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