निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३६ ) ४ अ० १ पा० ७ खं०
पित्र्यस्येव रायः । सोमराजन् प्रण आयूं ॑ षि
त रीरहानीव सूर्यो वासराणि ” ॥
[ ऋ० सं० ६, ४, १२, २ ]
(भा०) ईषणेन वा, एषणेन वा, अर्पणेन बा ते
मनसा सुतस्य भक्षीमहि, पित्र्यस्येवधनस्य । प्रव-
र्द्धय च नः आयूं ॑ षि सोमराजन् । “ अहानीव
सूर्यो वासराणि” । ‘वासराणि’ ‘वेसराणि’ विवा-
सनानि’ गमनानि-इतिवा ॥
‘ कुरुतन ’ ( ८ ) इति । अनर्थका उपजनाः
भवन्ति,-कर्त्तन, हन्तन, यातन,-इति ।
‘जठरम्’ ( ९ ) उदरंभवति । जग्धम् अस्मिन्
ध्रियते, धीयते वा ॥७॥
अनुवादः ।
[ इषिर (७) ] । मन्त्रार्थः- हे भगवन् ' सोम ! 'इषिरेण'
सब प्रकार से तेरे प्रति गए हुए 'मनसा'मनसे 'सुतस्य' निचोड़े
हुए का 'ते' तेरा ( अंश, जो हमारा,भाग है, उसे ) 'पित्र्यस्य'
बाप के 'रायः--इव' धन को जैसे 'भक्षीमहि' खाएं । हे 'सोम-
राजन् ' तू 'नः' हमारी 'आयूंषि' आयुओं को 'प्र-तारीः' बढा,
'सूर्यः' सूर्य 'वासराणि' वसन्त के 'अहानि-इव' दिनों को जैसे
बढाता है॥
निरुक्तार्थः 'इषिर नाम ईषणा ( गत ) या गए हुए का