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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 450, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 450

[क्योंकि ]श्रोणि(कूल्हा)चलते हुए की चलती हुई जैसी होती है ।
'शिताम' दो: या बाहु होता है । 'दो:' ' ' गतौ (भ्वा०
प०) धातु से है ।
'शिताम योनि (गुह्य) होती है, यह शाकपूणि आचार्य
मानते हैं ।
'शिताम' क्यों? । वह विषित या मल से व्याप्त होता है ।
जो अर्थ 'श्यामतः' पद से होता है, वही अर्थ 'शितामतः'
पद से होता है । अर्थात् "पार्श्वतः" इत्यादि गद्य मन्त्र में
'शिताम' नाम श्वास का है और 'श्याम' नाम यकृत् (पेटकी
कोई आंत) का है ।-यह तैटीकि आचार्य मानते हैं । 'श्याम'
शब्द 'श्यै' (भ्वा० आ०) धातु से है । [ क्योंकि-वह सम्पर्क से
होती है ] 'यकृत्' क्यों? । जैसे तैसे (विना परिश्रम) ही काटी
जा सकती है ।
'शितिमांस अर्थात् मेदा से' यह गालव आचार्य मानते
हैं । अर्थात् उनके मत में उक्त गद्य मन्त्र में 'शिताम' नाम
शितिमांस (श्वेतमांस) का है । 'शिति' शब्द 'शो' (दि० प०)
धातु से है 'मांस' क्यों? । जो कोई ही मान्य होता है, उसके
लिये बनाया जाता है। अथवा सुमनस् या सुन्दर मनसे लिया
जाता है । अथवा इस में मन सदन (स्थान) करता है इस से
यह मांस है । 'मेदस्' स्नेहार्थक 'मिद्' (दि० प०) धातुसे है॥३॥
१ (खं०४)
[निरु०-]"यदिन्द्र चित्र मेहनास्ति त्वादातमद्रिवः ।
१-"यदिन्द्र चित्र०" इति अग्रेर्भौमस्यार्षम् । अनुष्टुप् छन्दः
ऐन्द्री । स्वरपृष्ठानां स्वरसाम्नां प्रथमे स्वरसाम्नि "यज्जायथा
अपूर्व्य" इति स्तोत्रियः, स्वरपृष्ठानां "यदिन्द्रचित्रमेहना"इति
द्वे, "या इन्द्र भुज आभर" इति तृतीयानुरूपस्य-इति विनियोगः