निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १६ ) ४ अ० १ पा० १ सं०
निघण्टु-स्थ सं० | अनेकार्थ | तत्त्व (अर्थ) अवगम | निगमः
३७ | अप्रमायुवः | अप्रमाद्यन्तः । ( पा० ३ खं० ३ ) | "असत्रमायुवो रक्षितारो दिवे दिवे"
३८ | च्यवनः | च्यावनः । ( ऋषिः ) | "युवं च्यवानं सनयं यथा रथम्"
| | ( पा० ३ खं० ३ ) |
४१ | जहुरे | जहिरे । ( अनेकार्थधातुप्रकृ- | "जहुरे विचिंतयन्तः"
| | तिः ) ( पा० ३ खं० ३ ) |
४३ | क्राणाः | कुर्वाणाः । ( पा० ३ खं० ३ ) | "गीर्भिः क्राणा अनूषत" ।
४४ | वाशी | वाक् ( पदे अनेकार्थम् । ) | "वाशीभि स्ततक्षाश्मन्मयीभिः" ।
| | ( पा० ३ खं० ३ ) |
४५ | विषूच्यस्य | विष्वञ्चस्य । ( पा० ३ ख० ३) | "सशूद् दूर्यो विषूच्यस्य जन्तोः" ।
४७ | पिता | माता (पातवा) पालयितावा | "द्यौर्मे पिता" ।
| | जनयितावा । ( पा० ३ ख. ५ ) |
४८ | शंयोः | ( सुखंयोः ) ( पञ्चम्यन्तं वा ष- | "शशानः शंयोररपो दधात" ।
| | ष्ठ्यन्तं वा) शमनं च रोगाणां |
| | यावनं च भयानाम् । |
| | अथापिबार्हस्पत्य : । | "तच्छंयोरावृणीमहे"