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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 429, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 429

हिन्दी निरुक्त ( ९ ) ४ अ० १ पा० १ खं०
में 'अकूपारस्य' 'दावने' इन दोनों पदों का इसी अनुक्रम से
पाठ है, और समाम्नाय में 'दावने' (३२) 'अकूपारस्य, (३३)
इस प्रकार मन्त्रपाठ के विपरीत पाठ है। इससे जाना जाता
है कि-अन्य ही ऋषियोंने समाम्नायका समाम्नान (विरचन)
किया है, और अन्य ही यह भाष्यकार है। क्यों कि यदि एक
ही पुरुष समाम्नान और भाष्य को करता, तो प्रयोजन के
विना ही एक मन्त्र-स्थ दो पदों के पाठ क्रम को न बदलता ।
(उत्तर-) समाम्नाय में जो शब्द पढे हुए हैं; वे किसी मन्त्रार्थों
के अनुरोध से नहीं पढे गये हैं, किन्तु, स्वतन्त्रतासे सब पठित
हैं, इस लिये उन शब्दों में संयोगवशात् दो पद एक मन्त्र में
आगए और उन को भाष्यकार मन्त्रोक्त क्रम से ही व्याख्या
करते हैं, इस से दोनों ग्रन्थों के एक आचार्य होने में भी कोई
दोष नहीं है। भगवद्दुर्गाचार्य का यही समाधान पञ्चम अध्याय
में 'वाजपस्त्यम् ( ४६ ) वाजगन्ध्यम् ( ५० ) इन दो शब्दों
का भी हो सकता है।
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