निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३ ) ४ अ० १ पा० १ खं०
अनवगत भेद उदाहरण व्याख्या
(७) क्रमानवगत । “उपरमध्वं मे वचसे” देखो-नि० अ० २
पा०७ खं० ३ 'उप' मन्त्र के बीच से उठाकर आदि में
जोड़ा गया है ।
(८) विक्षेपानवगत । “द्यावामः पृथिवी”
(९) अध्याहारानवगत । “दानमनसो नो मनुष्यान् ”
(१०) व्यवधानानावगत । “बायुश्चनियुत्वान् ”
इसके अतिरिक्त कहीं एक पदके दो पद कर लिये जाते हैं,
जैसे-“ पुरुषादः ” का ‘ पुरुषानेदनाय’। कहीं दो पद भी
एक पद कर लिये जाते हैं,जैसे-“गर्भनिधानीं सनितुः” लोक में-
“पश्यतो हरः” । एवम् आख्यात भी नाम कर लिया जाता है,
जैसे-“ सर्वाणीन्द्रस्य धनानि विभक्ष्यमाणाः” लोक में-“पचत-
भृज्जता” “खादतमंदता” इत्यादि । कहीं नाम भी आख्यात
हो जाता है । जैसे-“सोमो अदाः” ( अ०५ पा० १ खं० ३ )
अश्नोति इत्यादि । इसी प्रकार मन्त्रों में शब्दों और अर्थों
में अनेक प्रकार का संकर या मेल है, उसे वहां जैसा देखें वैसा
करे । क्योंकि-वेदमें दृष्ट (देखे हुए ) के अनुसार विधि होती
है। प्रयोजन यह है, कि-वैदिक शब्दों की काट छाट की
विधि को वैदिक शब्द ही बताते हैं, उनके अनुशासन की
विधि किसी लौकिक व्याकरण के अधीन नहीं है ।
इस अध्याय में जिस जहा खण्डके बासठ (६२) शब्दोंकी
व्याख्या की जावेगी, उनमें ( १ ) आमि, ( २ ) रजः, ( ३ )
हेरः, ( ४ ) दयतिः, ( ५ ) ष्यन्तः ये पाँच ( ५ ) शब्द केवल
अनेकार्थ हैं । ( १ ) नूचित्, ( २ ) नूच, ( ३ ) ऋधक ये तीन
( ३ ) शब्द निपात, एवम् अनेकार्थ है । यद्यपि इनके पाठ
की इस गण में आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि-निपातों में