सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 421, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 421

❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖
❖ हिन्दी निरुक्त ❖
❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖❖
❧ नैगम काण्ड ❧
❄ भूमिका ❄
—❖—
समाम्नाय (निघण्टु) शास्त्र में नैघण्टुक, नैगम और
दैवत ये तीन काण्ड हैं। इनमें "गौः" से "अपारे" पर्यन्त
शब्दों का संग्रह रूप जो प्रथम तीन अध्यायों के परिमाण में
नैघण्टुक काण्ड है, उसकी व्याख्या उसके भाष्य निरुक्त में
विशेष रूपसे द्वितीय अध्यायके द्वितीय पाद् से तृतीय अध्याय
की समाप्ति तक पूरी होगई है। अब नैगम काण्ड, जो "जहा"
शब्द से "ऋबीसम्" शब्द पर्यन्त शब्दों का संग्रह रूप समा-
म्नाय का चतुर्थ अध्याय है, उसकी व्याख्या निरुक्त के चतुर्थ,
पञ्चम और षष्ठ (६ठे) अध्याय में होगी। इस काण्ड में
"जहा" (६२) "सस्निम्" (८४) और "आशुशुक्षाणिः" (१३२)
ये तीन खण्ड अर्थात् कुल दो सौ अठत्तर (२७८) शब्द हैं, उन
में से प्रथम "जहा" खण्ड के बासठ (६२) शब्दों की व्याख्या
क्रम से इस निरुक्त के चतुर्थ अध्याय में होगी।
जैसे अमरकोश के प्रथम काण्ड में स्वर्ग आदि एक एक
पदार्थके अनेक अनेक नाम हैं, उसी प्रकार समाम्नाय के प्रथम
काण्ड में पृथिवी और हिरण्य आदि एक एक पदार्थ के अनेक