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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 409, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 409

हिन्दी निरुक्त । १०३
'दस्र' वधार्थक '०स्म' (स्वा० प०) धातुसे है। क्योंकि वह
सहजमें काटा जा सकता है। 'अर्भक' क्यों ? कम हुआ हुआ
होता है। अर्थात् ह्रस्व या छोटा।
"उपोपमे.... सर्शोह मस्मि रोमशा गन्धारीणामिवाविका"
अर्थात्-रोमशा नाम बृहस्पतिकी पुत्री परिहास करते हुये अपने
पतिके प्रति कहती है कि-हे पति ! 'उप' पास आकर 'उप' आलि
ङ्गन करके मेरे ( अङ्ग ) को तुम छूओ। 'मे' मेरे अङ्गोंको 'दश्राणि'-
अल्प 'मा' मत 'मन्यथाः' मानो। ( क्योंकि 'अहम्' मैं 'सर्वा'
सारी या सब अङ्गोंमें 'रोमशा' रोमयुक्त 'अस्मि' हूं। 'इव' जिस
प्रकार 'गन्धारीणाम्' गन्धार देशकी भेड़ोंमें 'रोमशा' अच्छे रोमों
वाली 'अविका' कोई भेड़ होती।
"नमो महद्भ्यः"......... :
अर्थात, 'बड़ोंको नमस्कार, छोटोंको नमस्कार। ये दो इन
('दस्र' 'अर्भक' ) दो शब्दोंके निगम हैं।
तिरः \Bigg} ये दो प्राप्तके नाम हैं।
सतः /
'तिरः' तीर्ण ( तर गया हुआ ) होता है।
'सतः' संसृत ( फैला हुआ ) होता है।
“तिरश्चिदर्यया"......... ।
'हे अश्विनो ! तुम स्थान प्राप्त होने पर भी उसे छोड़ कर, किसी
कार्यमें रहते हुए भी उसे बदल कर शीघ्र गतिसे आओ। जो तुम
'अदाभ्य' किसीसे हिंसा नहीं किये जा सकते।'
“पात्रेव"............. ।