निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( नि० अ० ) मैं एक इस एक जगत्को तिरस्कार करता हूं ।
शत्रु ओंको तिरस्कार करता हुआ दो को ( भी ) तिरस्कार करता
हूं । क्या मेरा तीन कर सकते हैं ? [ एक पद निरुक्त ] 'एक'
इत या प्राप्त संख्या । [ दो आदि अन्य संख्याओंमें भी गई हुई
रहती है । ] 'द्वि' अधिक फैली हुई संख्या । [ एक की अपेक्षासे । ]
'त्रि' अधिकसे अधिक तैरो हुई संख्या । [ दो की अपेक्षा । ]
'चतुर' बहुत चली हुई संख्या [ तीनकी अपेक्षा । ] 'अष्ट' व्याप्ति
अर्थमें 'अश्' ( स्वा० आ० ) धातुसे है । [ क्योंकि वे सातको
व्यापन करके रहते हैं ] 'नव' यह संख्या 'न वननीय' या वाञ्छनीय
नहीं है । [ क्योंकि-नव ( ६ ) संख्या वाली तिथि नवमीमें कोई
शुभ कर्म नहीं होता । ] 'दश' यह संख्या दस्ता या सब संख्याओं-
का अन्त करने वाली है । अथवा दृष्टार्थ होनेसे 'दश' है ।
[ क्योंकि-एकादश द्वादश आदि संख्याओंके ऊपर फिर फिर देखी
जाती है । ] 'विंशति' दो वार दशसे । 'शत' दश वार दशसे ।
'सहस्र' क्यों ? सहस् नाम बलका है, सहस् वाला होनेसे 'सहस्र'
है । [ क्योंकि दुर्बलोंका भी सहस्र बलवान् ही होता है । ]
'अयुत' 'नियुत' 'प्रयुत' उस उसको दश दश वार अभ्यास करनेसे
होते हैं । [ अर्थात् सहस्र दश वार अभ्यास किया गया 'अयुत',
अयुत दश वार अभ्यस्त 'नियुत', और नियुत दश वार अभ्यस्त
प्रयुत होता है । ] 'अर्बुद' मेघ है । [ मेघ सादृश्यसे है । ]
'अम्बु' क्यों ? अरण या चलन करता है । उस ( जल ) को देने
वाला 'अम्बुद' । [ अर्थात् अम्बुदसे 'अर्बुद' होता है । ] अथवा
अम्बुमान् भान होता है । अथवा अम्बुवाला होता है । वह ( मेघ )
जिस प्रकार जलको बरसता हुआ महान् ( बड़ा ) बहु ( बहुत )
होता है, उसके समान बहु द्रव्य 'अर्बुद' कहाता है । [ ३य पाद ]
"खले न पर्षान् प्रतिहन्मि भूरि।" अर्थात् खल (खाता) में