निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 286, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें१२० २ अ० ७ पा० १ ख० ।
(खण्ड १)
[ निरु० ] वाङ्नामानि उत्तराणि सप्तपञ्चाशत् ।
‘वाक्’ कस्मात् ? वचेः । तत्र ‘सरस्वती’-इत्यस्य
नदीवद् देवतावच्च निगमा भवन्ति । तद्-यद्-
देवता वद्-उपरिष्टात् तद् व्याख्यास्यामः । अथ-
एतद्-नदीवत्-॥ १ ॥
अर्थ ।
प्रकृत मेघके नामोंसे आगे सत्तावन (५७) वाक्के नाम हैं।
‘वाक्’ शब्द किस धातुसे है ? ‘वच्’ ( अदा० प० ) धातुसे ।
उनमें ‘सरस्वती’ इस नामके नदीके समान और देवताके समान
निगम (वर्णनवाले मन्त्र) हैं । सो-जो देवताके समान हैं, उसे
सोलहवें या ग्यारहवे अध्याय, “पावका नः सरस्वती” ( ऋ० सं०
१, १, ६, ३) मन्त्रमें व्याख्यान करेंगे । और जो यह नदीके
समान हैं, [ उसकी व्याख्या की जातो है ] ॥ १ ॥
व्याख्या ।
मेघोंमें ही वाक् या शब्द अधिक होता है, इस कारण मेघ-
नामोंके अनन्तर वाक्के नाम कहे जाते हैं । वे ‘श्लोक’ ‘धारा’
‘इला’ इत्यादि हैं । श्रूयते इति श्लोकः । श्रवण किया जाता है,-
इससे ‘श्लोक’ है । ध्रियते तं तम्-अर्थम्-अवधारयितुम्-इति धारा ।
अर्थात् उस उस अर्थके अवधारण ( निश्चय ) करनेको धारण की
जाती है, इससे ‘धारा’ है। त तम् अर्थ प्रति ईष्टे-इति इडा ।
अर्थात् उस उस अर्थके प्रति समर्थ' है, इससे इडा और ड-ल के
अभेदसे ‘इला’ है। इसी प्रकार अन्य शब्दोकी व्याख्या करना
होगा ॥ १ ॥