निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । २७
वहां नाम पद गौण होकर आख्यात पदसे झुक जाते हैं, इसीसे
ये नाम कहाते हैं ।
(ख) नमन्ति स्वमर्थम् आख्यातशब्द-
वाच्येगुणभावेन इति नामानि ।
आख्यातके क्रियारूप अर्थमे० अपने अर्थको गौण भावसे
झुका देते हैं, इससे ये नाम कहाते हैं ।
जिस प्रकार आख्यातमें रहता हुआ भी द्रव्य इच्छासे छोड़
दिया जाता है, उसी प्रकार नाममै रहती हुई भी क्रिया गणना
नहीं की जाती । क्योकि नाम पदकी द्रव्यमे परता या अभि
निवेश होता है इसीसे उसमे जो क्रिया रहती है वह अपने विकार
से उत्पन्न होनेवाले नामार्थको बताकर वहांसे हट जाती है ।
ॅमानो 'पाचक' शब्दमे जो पाकक्रिया प्रतीत होती है, वह जन
समुदायमे पाचक पुरुषकी पहिचान कराके फिर वहांसे
चली जाती है। इसी कार्यके लिए उसका वहां निवास था ।
जब उस द्रव्यका पता चल गया तो फिर वहां वह अपना प्रयोजन
नहीं देखती ।
नाममें क्रियाका रहना ।
नाम पदमें तीन भाग होते हैं, —प्रकृति, (धातु) प्रत्यय (अ
क आदि) और विभक्ति (प्रथमा आदि) जैसे—'पाचक:' इस-
ॅमें पच् (धा०) अक (प्र०) और विसर्ग (:) विभक्ति है ।
यहां प्रकृति और धातु एक ही बात है। धातु क्रियाका
वाचक होता है, और वह नाममें विद्यमान है, इससे उसकी वाच्य
क्रिया भी वहां होनी चाहिए । जैसे कि—जहां जो अर्थ है, वहां
उसका वाचक शब्द भी अवश्य रहता है ।