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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 244

हिन्दी निरुक्त । ७७
और शन्तनु दो भाई थे । उन दोनोंमें छोटा जो शन्तनु था, उसने
अपना अभिषेक कर लिया, और अभिषिक्त होकर राजा हो गया ।
दूसरा-जेष्ठ, देवापि तप करने चला गया । फिर शन्तनुके राज्यमें
बारह वर्ष तक इन्द्र देवने वर्षा नहीं की । उसे ब्राह्मण बोले-तैने
अधर्म किया, कि-जेष्ठको बीचमें छोड़ कर अपना अभिषेक कर
लिया, इसी कारणसे-तेरे राज्यमें-देव नहीं बरसता है । उस
शन्तनुने देवापिसे प्रार्थना की ; कि-यह राज्य प्रस्तुत है । देवापि
उसे बोला कि-मै तेरा पुरोहित हो जाऊँ, और तुझे यज्ञ कराऊं ।
उस देवापिको इस वर्ष काम-सूक्तका आविर्भाव हुआ था । उस
'समुद्र' शब्दके जो जल-निधिके साथ सन्दिग्ध हैं, प्रविभागके
दिखानेके लिये यह ऋचा निर्वचन करनेवाली है ॥ १ ॥
व्याख्या ।
इस खण्डमें पन्द्रह हिरण्य नामों और सोलह अन्तरिक्ष नामोंकी
व्याख्या या भाष्य है । प्रायः सभी खण्डोंमें जो 'पञ्चदश' 'षोडश'
आदि संख्या दी गई हैं, वह निघण्टु ग्रन्थमें पठित शब्दोंकी संख्या-
का अनुवादमात्र है, किन्तु वह अन्य शब्दोंके निषेधके लिये नहीं।
इससे असाम्नात या अपठित पर्याय शब्द भी तहाँ तहाँ व्याख्येय
समझने चाहिये । जैसे कि-प्रथम खण्डमें 'हाटक' 'सुवर्ण'
'चामीकर' और शात कुम्भ आदि, और दूसरेमें दिव् 'द्यो' विहा-
यस्,-आदि ।
पृथिवीमें ही सुवर्ण होता है, इस कारण पृथिवी नामोंके अन-
न्तर 'हिरण्य' नाम कहे गये हैं ।
आद्य-खण्डमें एक 'हिरण्य' शब्दका ही निर्वचन किया है।
उसमें दिखाया कि,एक ही हरण-क्रिया द्विविध सम्बन्धसे 'हिरण्य'
शब्दको बनाती है, या उसे स्वर्ण-द्रव्यमें ले जासकती है। जैसे-
[ १ ] शिल्पी भी कटक, कुण्डल आदि भूषणोंके बनानेको उसे