सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 174

६ २ अ० १ पा० १ खं० ।
है। अर्थात् जो शब्द दुर्बोध्य या परोक्षवृत्ति तथा अपरोक्षवृत्ति हैं,
जैसे—बिल्म, कुदरं, उदार, चैतस, पव आदि शब्द हैं वेही व्युत्प-
तिके साथ निर्वचन किये जाते हैं। उन्हीं शब्दोंमें निरुक्तकी विशे-
षरूपसे सार्थकता है। उन्हींको अर्थ सामान्यसे या शब्द सामा-
न्यसे निर्वचन करे। उनमैं व्याकरणोक्त संस्कारका आदर न करे।
व्याकरणके अनादरका मुख्य कारण यह है कि—परोक्षवृत्ति
शब्द जो 'असमर्थ स्वर संस्कार' नामसे विभाग किये जा चुके हैं,
उनकी व्याकरणके अनुसार चलने या न चलने पर, भी किसो अर्थमें
वृत्ति नहीं टिकती, अपितु नानाभावसे अनेक अर्थोंमें जाती है, नहीं
निश्चय होता किं—“ऐसे होगा ? या ऐसे होगा ?” विचार करते
हुए मनुष्य विरुद्धपक्षसे मोहको प्राप्त होजाते हैं। जब कि—इनकी
वृत्ति उक्त प्रकारसे अवस्थित नहीं होती, तो व्याकरणके पीछे लगे
ही रहनेसे क्या होगा ? इससे व्याकरण पर नितराम् निर्भर नहीं
रहना होगा ।
शब्दोंकी वृत्तियोंके भेद ।
(१) कोई शब्द अर्थके सादृश्यसे कहीं, (२) कोई स्वरके सादृश्य
से कहीं, (३) और कोई वर्णके सादृश्यसे कहीं, रहते हैं। इसी
प्रकारसे विभक्तियोंका भी पूर्व-पर प्रकरणोंके अविरोध पूर्वक अर्थके
अनुसार परिवर्त्तन होता है। क्योंकि—उनका भी व्यत्यय या विप-
रीतभाव देखा जाता है। जैसे कि—वैयाकरणोंने कहा है—
“सुपांस्थाने सुपोभवन्ति”—
इसका तात्पर्यार्थ यह है कि—चाहे जिस विभक्तिके स्थानमें
चाहे जो विभक्ति होजाती है। जैसा कि—आचार्य (दै० कां०
६, ३, १२ ) दिखावेंगे भी-‘हृत्सुशोकैः” ७-१‘हृदयानिशोकैः’
इत्यादि। अर्थात् यहां द्वितीयाके एक वचनके बदलेमें, उसका
बहु वचन लिया जाता है।