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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 168

१ खण्ड सूत्र--
समाम्नायः (१) तत्र॑ चतुष्ट्वम् (२) अ॑तोऽन्ये (३)
अ॑थ निपाताः (४) वा॑युर्वात्वा (५) न नूनम् (६) नूनं
सा ते (७) ऋचान्त्वः (८) अ॑क्षरावन्तः (६) नि॑ष्ट्‌व-
क्तासः (१०) हविर्भिः (११) इतीमानि (१२) अथा-
पि यः (१३) य॑थोहि नु (१४) अथापीदम् (१५) अ॑र्थ-
वन्तः (१६) अथापीदम् (१७) स्थाणुरयम् (१८) उतत्वः
पश्यन् (१८) उ॑तत्वं सख्ये (२०) विंशतिः (२०) ॥
इति निरुक्ते पूर्वषट्के प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
१—“गौरश्वः ०—० औदुम्बरायणः” इतना भाग १ खण्डका
इसमें सम्मिलित है, तथा इसी खण्डका भाग “षड्भाव विकाराः”
तीसरा खण्ड है।
२—इसका एक भाग “आ इत्यार्वागर्थे” यह ५वां खण्ड किया
हुआ है। ( १मः पादः)
३—“चिदित्येषः” २रा और “वृक्षस्यनु” ३रा खण्ड इसीके
अंश हैं।
४—यह “वृक्षस्यनु” इस खण्डके अन्तमें सन्निविष्ट है। और
“अह इतिच” यह इसीका भाग है। (द्वितीयः पा० )
५—इसका अन्तिम भाग “पर्याया इव ०—० कमोमिद्विति”
अगले खण्ड निष्ट्‌वक्तासः” के आदिमें है।
६—इसका अन्तिम भाग “सुविदुरिव ०—० परिभये” अगले
“हविर्भिः” खण्डके आदिमें संयुक्त है। ( ३यः पादः)
७—इसीका भाग “अथाप्येवम्” पद खण्ड है। (४र्थः पादः)
८—यह पूर्व खण्डके अन्तमें संयुक्त है, इसीका शेष मीलन्तौ
यह पर खण्ड है। ( ५मः पादः)
६—इसीके भाग—“साक्षात्कृतधर्माणः” और “अश्वं न त्वा”
ये खण्ड हैं।