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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 162

१६४ अ० १ पा० ६ ख० ६ ।
प्रीणाति,-इति । तत्प्रकृति इतरत्, बन्धिसामान्यात् ।
मेघस्थायी । मेघोऽपि गिरिः, एतस्मादेव ।
तद्यानि नामानि प्राधान्यस्तुतीनां देवतानां तद्
‘दैवतम्’ -इत्याचक्षते । तद् उपरिष्टाद् व्याख्या-
स्यामः । नैघण्टुकानि इह इह ॥ ६ ॥
अनुवादः ।
“अश्वं न०० ’ [ ऋ० सं० १, २, २२, १ ] । [पदार्थ - ] अश्वके
समान बालवाले तुझको । [ व्याख्या पद निरुक्त ] ‘बाल’ जो दंशो
या मच्छरोंके हटानेके अर्थ हों । [ व्याख्याकी व्याख्याके पदका
निरुक्त ] ‘दंश’ शब्द ‘दंश’ दर्शने धातुसे बनता है । “मृगो न भीमः
कुचरो गिरिष्ठाः” [ ऋ० सं० ८, ८, ३८, २ ] [ पदार्थ-] हे इन्द्र !
तू मृगके समान भीम कुचर और गिरिष्ठा है। [ यहां ‘इन्द्र’ प्रधान
और ‘मृग’ शब्द नैघण्टुक है ] [ एक पद निरुक्त-] ‘मृग’ गत्यर्थक
‘मृज्’ धातुसे होता है । ‘भीम’ जिससे प्राणी डरें । [ समान
शब्दका निरुक्त- ] ‘भीष्म’ शब्द भी इसी [ ‘ञिभी’ भये ] धातुसे
बनता है। [ एक पद निरुक्त-] ‘कुचर’ जो कुत्सित या बुरा कर्म
करता है। और जो देवताका कथन हो,-[ तो-] कहां यह नहीं
जा सकता, अर्थात् सर्वत्र जानेके सामर्थ्यसे ‘कुचर’ है । ‘गिरिष्ठाः’
गिरिमें रहनेवाला । ‘गिरि’ पर्वत । [क्योकि-] वह ऊपरको निकला
हुआ होता है । [व्याख्या-पद निरुक्त-] पर्ववाला होनेसे पर्वत है ।
[ विग्रहपद निरुक्त-] ‘पर्व’ नाम जो पूर्ण करे, अर्थात् ( शिला )
सन्धि । अथवा तृप्ति अर्थवाले ‘प्री’ धातुसे ‘पर्व’ बनता है । [अर्थ-
तत्व-] आधे मासकी सन्धि [अमावास्या या पूर्णिमा ] । [क्योंकि-]
इसमें देवताओको हवियोंसे तृप्त किया जाता है । [ यह ] दूसरा