निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 152, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें१५४ अ० १ पा० ६ ख० ३ ।
अ॒र्द्धम् । अपि॒ कस्मै॑ त॒न्वं॑ विस॒स्रे, इति । स्वम्
आत्मानं विवृणुते उज्ञानं प्रकाशनम्-अर्थस्य आह
अनया वाचा । उपमोत्तमया वाचा-जायेव पत्ये
कामयमाना सुवासाः ऋतुकालेषु । सुवासाः कल्याण-
वासाः कामयमाना ऋतुकालेषु । यथा व एनां
पश्यति, स शृणोति, -इति-अर्थज्ञप्रशंसा ।
अनुवाद ।
एक पुरुष देखता हुआ भी वाणीको नहीं देखता, और सुनता
हुआ भी इसे नहीं सुनता । यह ऋचाका आधा भाग अविद्वान्को
कह रहा है। [३ य पाद-] [वाणी-] एक [विद्वान्] के लिये
तन् (शरीर) को दिखाती है। अपने आत्माको फैलाती है।
इस तीसरे पादसे ऋचा अर्थ के उज्ञान या प्रकाशनको कहती है।
उपमोत्तमा वाक् वा चौथे पादसे [कहती है-] जैसे-ऋतुकालमे
सुवस्त्रवाली कामयुक्त जाया (पत्नी या भार्या) पतिके लिये
[अपने शरीरको ] [एक पद निरुक्त] 'सुवासाः' नाम कल्याण
वस्त्रवाली कामना करती हुई ऋतुकालमें। [जैसे] वह [विद्वान्]
इस (वाणी!) को देखता है, यह सुनता है। यह अर्थज्ञकी
प्रशंसा है।
व्याख्या ।
“उतत्वः” ० ० [ ऋ० स० ८, २, २३, ४ ]
विद्यासूक्ते द्वे अपि एते ऋचौ बृहस्पतेरार्षम् ।
बहुतसे मनुष्योंमें सबके एकसे पीठ, पेट, हाथ तथा पैर होने
परभी और एक गुरुसे एक साथ एक ही रीतिसे पढ़ने पर भी,