निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्तः । १४३
अतिरिक्त कोई अवलम्ब नहीं है कि—जिससे पदविभाग एक
प्रकारसे स्थिर किया जाय ।
मयो भूर्वातो अभिवातूखा ऊर्जस्वतीरोषधी
रारि शन्ताम् । पीवस्वतीर्जीवधन्यः पिबन्त्व वसाय
पद्धते रुद्रमृल ॥ ( ऋ० सं० ८, ८, २७, १ )
सुचरो नाम गौतमः समयोभूरित्यृचा त्रिष्टुभः
पूर्वै स्त्रिभिः पादैः गवामाशिष माशास्योत्तमे न
ता सामेवच रुद्रात्सुखमयाचत । गवामुपस्थाने
विनियुक्ता । ( भ० दु० )
मयोभूरिति चतुर्ऋ चमष्टादशं सूक्तं कक्षीवद्
गोत्रस्य शबरस्यार्षं त्रैष्टुभं गोदेवत्यम् ।” घासाय
वनंप्रतिष्ठमानागाः आदितोद्वाभ्यामभिमन्त्रणीयाः ।
( सा० भा० )
आरोग्यका उत्पन्न करनेवाला पश्चिम दिशाका वायु इन गौओंके
सामने चले और ये गौवें उस सुखकारी एवम् अनुद्वेग या अभय
प्रद वायुके स्पर्शसे घने रसवालो ओषधियोंको चरें तथा सुख-
कारी ओषधियोंका स्वाद ले लेकर अपने वाञ्छित समयमें जीवोंको
प्राण देनेवाले जलको पीवें, और ओषधि सहित पान किया हुआ
वह जल इन गौओंके उदरकोष्ठमें रस-शोणित-मांस-मेदा-मज्जा
तथा अस्थिके रूपसे पके, एवम् ये मोटी बलवती बहुत दूधवाली
हो जायें, हे रुद्र ! तुम भी इस पाद् (पैर) वाले गोरूप अवस
नाम अन्नके लिये सुखरूप हो, अर्थात् इनकी हिंसा न कर ।