निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५११ ) १२अ० ३पा० ७ख०
अथवा काशन से 'केशी' है । अथवा प्रकाशन से 'केशी' है ।
दोनों में अर्थ और धातु समान हैं ॥
“तस्य०” उस ( केशी ) की यह ऋचा है ॥६[२५]॥
[ खं० ७ ]
निरु०-“केश्य१ग्निं केशी विषं, केशी विभर्त्ति
रोदसी । केशी विश्वं स्वर्दृशे केशीदं ज्योतिरु-
च्यते ॥” [ ऋ०सं० ८, ७, २४, १ ] ॥
केशी अग्निं च विषं च ।
'विषम्'-इति उदकनाम । विष्णातेः = विपूर्वस्य
स्नातेः शुद्धार्थस्य । विपूर्वस्य वा सचतेः । द्यावा-
पृथिव्यौ च धारयति । केशी इदं सर्वम् इदम्
अभिविपश्यति केशी इदं ज्योतिः उच्यते ।
इत्यादित्यम् आह ।
अथापि एते इतरे ज्योतिषी केशिनी उच्येते ।
धूमेन अग्निः, रजसा च मध्यमः ।
तयोः एषा भवति ॥ ७ [२६] ॥
अर्थः- "केश्यग्निं०" इस ऋचाका जूतिनाम ऋषि है।
'केशी' देव 'अग्निं बिभर्ति" अग्नि को धारण कर
ता है- वर्षा से जल के द्वारा ओषधियों ही उत्पन्न कर के
आहुति के द्वारा अग्निका पोषण करता है । "केशीविषम्"
केशी विषको धारण करता है- 'विष' यह जल का नाम है