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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1225

८ हिन्दी निरुक्त ( ४६३ ) ११ अ० ४ पा० १५ खं०
भिर्वशी वा गृणातु । उर्वशी वा बृहद्दिवा गृणाना
भ्यूर्णाना प्रभृत्यस्यायोः । सिषक्तु न ऊर्जव्यस्य
पुष्टेः ॥” [ ऋ०सं० ४, २,१६, ६७ अथ०वा० ५,
३, ९, १९-२० ]
अभिगृणातु नः इला यूथस्य माता सर्वस्य माता
स्मदभि नदीभिः उर्वशी वा गृणातु उर्वशी वा
बृहद्दिवा महद्दिवा गृणाना अभ्यूर्णाना प्रभृत्यस्य
प्रभृतस्य आयोः अयनस्य मनुष्यस्य मनुष्वस्य
ज्योतिषो वा उदकस्य वा सेवतां नः अन्नस्य
पुष्टेः ।
‘रोदसी’ रुद्रस्य पत्नी ।
तस्या एषा भवति– ॥ १५ ( ४९ ) ॥
अर्थः-“अभिन इला०” इस ऋचा का अग्नि ऋषि
और शक्वरी छन्द है । “यूथस्य माता” मेघसमूह की
माता = निर्माण करने वाली “उर्वशी वा” जो उर्वशी
नाम से कही जाती है, या इडा नाम से कही जाती है, सो ‘इला’
मध्यमा देवी ‘नः’ (अस्मान्) हमें ‘अभिगृणातु’ [अभिशब्दयतु]
बोले । कैसे ? ‘नदीभिः’ (नदनाभिः अद्भिः ) नदियों से =
शब्दवाले जलों के द्वारा । ‘उर्वशी वा’ उर्वशी के समान ‘दिवा’
बिजली सहित जल समूह से ‘बृहत्’ (महत) बहुत ‘गृणाना’
बोलती हुई ‘अभ्यूर्वाना’ इस जगत् को आच्छादन करती

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