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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1127

हिन्दी निरुक्त (३६३) १० अ० ३ पा० ११ख०


(खं० ११)
निरु०- “वात आवातु भेषजं शम्भु मयोभु नो
हृदे । प्रण आयूँषि तारिषत् ॥” [ऋ० सं० ८,८,
५४, १ । सा० सं० छ० आ० २,२, ४, १० ]
वात आवातु भेषज्यानि शम्भु मयोभु च नो
हृदयाय प्रवर्द्धयतु च नः आयुः ।
‘अग्निः’ व्याख्यातः ।
तस्य एषा भवति ॥११(३५) ॥
अर्थः-“वात आवातु०” इस ऋचा का उल्लव वाता-
यन ऋषि है। ‘वात:’ पवन देव ‘भेषजम्’ [भैषज्यानि] जो
जो हमारे लिये पथ्य हो, उसे ‘आवातु’ हमारे सामने लावे
‘शम्भु’ और वह हमारे लिये सुखकारी हो तथा ‘हृदे’ हमारे
हृदय के लिये ‘मयोभु’ सुख दायक हो, ‘नः’ [ अस्माकम् ]
हमारी ‘आयूंषि’ आयु को प्रतारिषत्’ [ प्रवर्द्धयतु] बढावे ।
‘अग्नि’ (१३) शब्द की व्याख्या [ ७, ४, १ ] की
जाचुकी है ।
“तस्य०” उसकी यह ऋचा है ॥११(३५)॥
व्याख्या ।
“वात आवातु०” इस मन्त्र में वायु देवकी प्रार्थना से
स्पष्ट कहा गया है कि- शुद्ध वायु से शरीर में नैरोग्य आयु
की वृद्धि और हृदय की पुष्टि अतएव ज्ञान की वृद्धि होती
है तथा शुद्ध वायु ही प्रधान पथ्य है ॥११(३५)
(खंड १२)
निरु०-“प्रति त्यं चारु मध्वरं गोपीथाय प्रहूय*