निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३५५ ) १० अ० ३ पा० ६ खं०
वरन्ते” ( न केचिद् वारयन्ति ) कोई हटा नहीं सकते या
रोक नहीं सकते “युवतिं न शर्याम्” .( प्रयुवतीम् इव
शरमयीम् इषुम् ) वेग से अवकाश से अवकाशान्तर में मिलती
हुई = तेजी से जाती हुई शर की बनी हुई इषु ( बाण ) के
समान् । अर्थात्-बाण की गति के समान उसकी गति को
कोई रोक नहीं सकता । ऐसे प्रभाव वाला तार्क्ष्य हमारा यह
कल्याण करे, ऐसे प्रार्थना जोड़ लेना चाहिए ।
'मन्यु' [१८] (क्रोध) शब्द दीप्ति अर्थ में क्रोध अर्थ में
अथवा वध अर्थ में 'मन' [ दि० आ० ] धातुसे है । क्योंकि-
'मन्यन्ति ( मन्यन्ते ) अस्माद् इषवः' इससे बाण प्रकाशित
होते हैं = जिसे क्रोध होता है, वही बाण फेंकता है !
“तस्य०” उस मन्यु देव की यह ऋचा है—॥५[२९]॥
( खं० ६ )
निरु०-“त्वया मन्यो सरथमारुतजन्तौ हर्षमा-
णासोऽधृषिता मरुत्वः । तिग्मेषव आयुधा संशि-
शाना अभिप्रयन्तु नरो अग्निरूपाः ॥” (ऋ सं०
८,३,१९,१) अ०सं०४,३१,१)
त्वया मन्यो सरथम् आरुह्य रुजन्तो हर्षमाणासोऽ
धृषिता मरुत्वः तिग्मेषवः आयुधानि संशिशयमानाः
अभिप्रयन्तु नरो अग्निरूपाः अग्निकर्माणः
संनद्धाः कवचिनः इति वा ।
दधिक्रा व्याख्यातः, तस्य एषा भवति-॥६(३०)॥