निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1106, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३४१ ) १० अ० ३पा० १ खं०
छादन करलेता है, जो 'मधुमन्तः' मिठास वाली हैं 'घृतश्चुतः'
घृत = उदक ( जल ) को झरने वाली हैं, 'तेभिः' उन से 'नः'
हमको 'अविला' रक्षा करने वाला 'भव' हो ॥११(१४)||
इति हिन्दीनिरुक्ते दशमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥१०,२
तृतीयः पादः ।
(खं० १)
निघ०-विश्वकर्मा (१६) तार्क्ष्यः (१७)
मन्युः (१८) दधिक्राः (१६) सविता (२०)
त्वष्टा [२१) वातः [२२] अग्निः (२३)।
निरु०-'विश्वकर्मा' सर्वस्य कर्त्ता ।
तस्य एषा भवति ॥१(२५)॥
अर्थ :-'विश्वकर्मा' (१६) क्यों ? वह 'सर्वस्य कर्त्ता' सब
का कर्त्ता है । जो कुछ और जितना भी यह भूत भविष्यत्
और वर्त्तमान जगत् है, उस सब का कर्त्ता = करने वाला है।
यदि सब का कर्त्ता है, तो मध्यम क्यों है ? 'कर्त्ता' क्रिया
वाले = चेष्टा वाले को कहते हैं, और क्रियायें सब वायु की
ही होती हैं, और पृथिवी आदि सब तत्व ( भूत ) स्थावर
हैं । इससे कर्त्ता मध्यम ही होसकता है ।
वह सबको कैसे करता है ? पृथिवी, जल, तेज (अग्नि)
और वायु इन चार वस्तुओं (द्रव्यों) से शरीर का निर्माण
होता है, और उसी के द्वारा सब क्रियाएं होती हैं, जिसके
कारण वह कर्त्ता कहा जाता है । भाव यह है कि- पृथिवी
और जल ये दो धातु पहिले मिलते हैं, और इन दोनों मिले