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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1083, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1083

हिन्दी निरुक्त ( ३१८) १० अ० २ पा० ३ खं०
'भिन्न २ ऋचा के अर्द्धों में समान अर्थ में विलक्षण २
पदों के व्यवधान से जो पद दुवारा आते हैं, उनका प्रकृत
अर्थ के अनुस्मरण के लिये कीर्त्तन आवश्यक होता है, इससे
वे जामि नहीं, किन्तु अजामि हैं। जैसा कि पूर्व मन्त्र में
“मधुम॑न्त॒म्” “मधुश्चुतम्” उदाहरण दिया है। इस
लिये एक ही पाद में किसी दूसरे पद के व्यवधान से समान
अर्थ में आया हुआ पद ही 'जामि' या पुनरुक्त होता है।
क्यों कि- तब तक पूर्व पद के अर्थ की स्मृति नष्ट नहीं होती
है, और इसी से उस के उस समय तक दोहराने की आव-
श्यकता नहीं है, जैसा कि— “हिरण्यरूपः स हिरण्य
संदृक्” । क्यों कि- जो हिरण्यरूप होता है, वह अवश्य
ही हिरण्य जैसा होता है, अतः हिरण्यसंदृक् यह जामि
(पुनरुक्त) होता है। इस दूसरे मत से पूर्व मत का खण्डन
होगया और उसी का परिष्कार रूप दूसरा मत खड़ा होगया
अवश्य ही पूर्व मत के रहने पर मन्त्रों में बहुत अधिक जामि
दोष आता था, किन्तु अब इस सरे मत के उदय होते ही
वह दोष ऋचा के एकही पादमें दो पर्यायों के आने से होगा,
किन्तु विलम्ब से जो पर्याय एक मन्त्र में दुवारा आते हैं,
वे जामि नहीं होंगे।
अथापि भाष्यकार के विचार में मन्त्रों में अल्प दोष
भी सहनीय नहीं है, इस लिये आपने— “यथा कथा च
विशेषः अजामि भवति –इति अपरम्” यह तीसरा
मत भी रख दिया है। इसी मत पर आचार्य के मत का भी
पर्यवसान है।