निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३११ ) १० अ० २ पा० २ ख०
( खं० २ )
निरु०-“क्षेत्रस्य पतिना वय हितेनेव जयामसि।
गामश्वं पोषयित्न्वा त्सख्या) सनो मृलातीदृशे॥”
( ऋ०सं०३ ८, ९, १ )
क्षेत्रस्य पतिना वयं सुहितेन- इव जयामः, गाम्,
अश्वं, पुष्टं पोषयितृ च आहर-इति। “सनोमृलाति
ईदृशे” बलेन वा धनेन वा ।
‘मृलतिः’ दानकर्मा वा पूजाकर्मा वा ॥
तस्य एषा अपरा भवति ॥२ (१५)॥
अर्थः-“क्षेत्रस्य पतिना वयम्०” इस ऋचाका वाम-
देव ऋषि है। क्षेत्र पति के अर्थ चरु की पुरोनुवाक्या है।
‘क्षेत्रस्य पतिना’ क्षेत्र के पति से ‘वयम्’ हम ‘ सुहितेन
इव’ किसी उत्तम आप्त = प्रामाणिक = प्रतिष्ठित मित्र से जैसे
संयुक्त होकर ‘जयामसि’ (जयामः) जीतें या समर्थ हों। [कैसे
‘गाम्’ गौको ‘अश्वम्’ घोड़ेको ‘पोषयित्नु’ [पुष्टं पोषयितृ च]
और जो वस्तु स्वयम् पुष्ट हो और पोषण करने वाली हो,
उसे ‘आ’ (हर) ला, ऐसे । अर्थात्- क्षेत्रपति देव के प्रसाद से
गौ घोड़े और अच्छे पदार्थ जो सुखदायक हों हमें मिलें,और
दास दासी भी मिलें, जिनसे हम कहे ‘यह ला’ ‘वह ला’
इत्यादि । ‘सः’ वह ‘क्षेत्रपति देव ‘नः’ हमारे लिये ‘ ईदृशे’
ऐसे भोग के लिये अभीष्ट धनों को ‘मृलाति’ (ददातु) देवे या
[पूजयतु] पूजे ।
‘मृलति’ धातु दान अर्थ में या पूजा अर्थ में है ॥