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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1065, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1065

हिन्दी निरुक्त ( २६६ ) १० अ० । पा० = खं०
अर्थात्-जो रुद्र अग्नि में जो जलों में जो ओषधियों के
मध्यमें, वीरुध् (तृणों) के मध्य में प्रवेश किये हुए है, जिसने
इनमें प्रवेश किया था, जिसने इन सब भुवनों को बनाया है
उस रुद्र अग्नि को नमस्कार हो । इस मन्त्र में स्पष्ट ही अग्नि
और रुद्र का अभेद है ॥
'इन्द्र' ( ४ ) क्यों ? इरा (अन्न) को विदारण करता है-
वर्षा से बीज को भिगोकर अङ्कुर उत्पन्न करता हुआ उसे
फाड़देता है। इस प्रकार यह 'इरादार' का 'इन्द्र' नाम है।
यही देवताओं के नामों की परोक्षता है, कि वे प्रत्यक्ष वृत्ति
शब्दों के संक्षेप या विकृत शब्द रूप हैं। 'इन्द्र' शब्द का
पूर्व भाग 'इरा' शब्द से है और दूसरा भाग 'दृणाति' से या
'दार' से है। जैसे "अग्रणी" से "अग्नि"। ऐसे परोक्ष
नाम देवताओं को बहुत प्रिय हैं, वे प्रत्यक्ष प्रशंसा के नामों
से अप्रसन्न होते हैं। जैसा कि-
“परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः”
( ब्राह्मण ) ।
यही प्रकार अन्य देवताओं के नामों के अर्थों में ध्यान
में रखना चाहिए।
देवता अपने तत्व को अपने नाम में छिपाकर अविद्वानों
से सदा परोक्ष = अप्रत्यक्ष रहते हैं, किन्तु विद्वान् पुरुष उनके
नामों की व्युत्पत्ति के द्वारा दिव्य दृष्टिसे उनके आत्मतत्व
को जानकर उनके स्वरूपको प्राप्त होते हैं। इस प्रकार देवता-
ओं के नामों की व्युत्पत्ति में सकल पुरुषार्थ = मनुष्य का
सम्पूर्ण आङ्कित स्थापित है, इसी सिद्धि के लिये देवता
नामों के निर्वचन में महान् यत्न किया जाता है।