निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २६६ ) ६ अ० ४ पा० १ खं०
( खं० २ )
निरु०-“ आयजी वाजसातमा ता ह्यु १ च्चा
विजर्भृतः । हरी इवान्धांसि बप्सता ॥” [ऋ०सं०
१, २, ६६, २ ] ॥
आयष्टव्ये अन्नानां संभक्ततमे तेह्युच्चै र्विह्रियेते
हरी इवान्नानि भुञ्जाने ॥
‘हविर्धाने’ हविषां निधाने ।
तयोः-एषा भवति— ॥ २ [३६] ॥
अर्थः- “ आयजी वाज०” ‘ता’ (ते उलूखल-
मुसले ) वे उलूखल = ऊखल और मूसल ‘आयजी’ (आयष्टव्ये)
संमुख भाव से पूजनीय ‘वाजसातमे’ (अन्नानां संभक्ततमे )
अन्नों के भले प्रकार सेवन करने वाले ‘उच्चा’ ( उच्चैः ) ऊंचे
‘विजर्भृतः’ ( विह्रियेते ) विहार करते हैं, या विहरण किये
जाते हैं। अवघात = मूसल की चोट से ऊखल ऊपर को
आता है, और मूसल मारने के लिये उठाया जाता है, यही
दोनों का उच्च विहार है। वे दोनों हमारे घर में ‘हरी- इव’
घोड़ों के समान ‘अन्धांसि’ (अन्नानि ) अन्नों को ‘बप्सता’
भुञ्जाने ) संस्कारक या सुधारने वालों के रूप में खाने वाले
हों-( यह हम चाहते हैं ) ।
‘हविर्धाने’ ( ३० ) ( दो शकट या गाडे ) क्यो ? हवि-
ष्यों के धारण करने वाले ।
“तयोः” उन दोनों हविर्धानों की यह ऋचा
है- ॥ २ ( ३६ ) ॥