निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1025, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २६९ ) ६ अ० ३पा० ६ खंड
भी जम करके स्थित होती है। इतनाही नहीं किन्तु -
'त्वेषम्' ( महत् ) अपार 'तमः' ( रजः ) अंधेरा 'आवर्तते'
लौटता है-इतना अधिक तेरा अन्धकार है कि-वह सारी
त्रिलोकी को पूरण करके भी बचता है और वह इधर ही
'( पृथिवी लोक में ) लौट आता है। ऐसे प्रभाव वाली तू
हमारे लिये कल्याण रूप हो ॥
'अरण्यानी' (२४) क्या ? अरण्य (वन) की पत्नी (स्त्री) ।
'अरण्य' क्यों ? वह 'अपार्ण ' = अपगतजल = निर्जल
होता है। अथवा ग्राम की अपेक्षा अरमण = असुन्दर
होता है।
“तस्या०”उस (अरण्यानी) की यह ऋचा है-॥८(२६) ॥
( खं०६ )
निरु०-“अरण्यान्यरण्यान्यसौ या प्रेव नश्यसि
कथा ग्रामं न पृच्छसि न त्वा भीरिव विन्दती ३॥
( ऋ० सं० ८, ८, ४, १) ॥
'अरण्यानि !' इति एनाम् आमन्त्रयते ।
या असौ अरण्यानि वनानि पराची इव नश्यसि,
कथं ग्रामं न पृच्छसि, 'न त्वा भीर्विन्दति-इव'
इति 'इवः' परिभयार्थेवा ।
'श्रद्धा' श्रद्धानात् ।
तस्या एषा भवति-॥ ९ [३०] ॥
अर्थ:- “अरण्यान्यरण्यानि०” इस ऋचाका ऐरम्मद्