निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २५५ ) ६ अ० ३ पा० ६ खं०
“अथ एकपदानिरुक्तम् ” पहिले मन्त्र का समस्त या
मिलित अर्थ करना चाहिए और फिर एक २ पदका निर्वचन
क्योंकि-बीचमें एक २ पद की स्वतन्त्र २ व्याख्या करने से
वाक्यार्थ का ग्रहण विलम्बित हो जाता है ॥ ५ ( २६ ) ॥
(खं०६)
[निरु०-आपोहिष्ठामयो भुवस्तान ऊर्जेदधातन ।
महेरणाय चक्षसे ॥ ” [ ऋ० सं०७,६,५,१ ] ॥
आपो हि स्थ सुखभुवः, तानो अन्नाय धत्त,
महते च नो रणाय रमणीयाय च दर्शनाय ॥
‘ओषधयः’ ओषद् धयन्ति-इति वा । ओषति
एना धयन्ति इति वा । दोषं धयन्ति-इति वा ।
तासाम्-एषा भवति- ॥ ६ ( २७ ) ॥
अर्थः-“आपोहिष्ठा०”इस ऋचाका सिन्धुद्वीप ऋषि है।
हे ‘आपः ! ’ जल ! (यूयम्) तुम ‘आपः’ व्यापन करने
वाले ‘स्थ’ हो । ‘मयोभुवः’ ( सुखभुवः ) सुखको उत्पन्न करने
वाले हो । ‘ताः’ सो आप ‘नः’ हमें ‘ऊर्जे’ ( अन्नाय ) अन्न
के लिये ‘दधातन’ ( धत्त = धारयत ) धारण करो-जिसप्रकार
हम अन्नको प्राप्त हों ऐसा करो । ‘महे-रणाय’ (महते रमणी-
याय ) और महान् रमणीय = सुन्दर धनके अर्थ, और ‘चक्षसे’
( दर्शनाय ) श्रुति, स्मृति में कहेहुए अर्थ के यथार्थ ज्ञान के
लिये हमें धारण करो-जिसप्रकार यह सब हमें मिले ऐसाकरो।
‘ओषधयः’ (२२) (ओषधिएं ) क्यों ? ‘ओषद् धयन्ति’
जो कुछ शरीर में क्षय आदि रोग होता है, उसे सेवन की