नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यन्तरण है:
शुद्धिपत्र ५५५
पृष्ठ पङ्क्ति अशुद्ध शुद्ध
४०० १ मकर के कर्णो की मकर के कर्णों की
४०० २८ अन्यत्र ( नास ग्रन्थों में ) अन्यत्र ( नाट्य ग्रन्थों में )
४०२ ११ मुक्ति = अर्थ के विषय में० युक्ति = अर्थ के विषय में०
४०३ २१ अवश्य प्रयोग द्वारा
किया जाए । अवश्य प्रयोग किया जाए ।
४०४ १७ करने से ‘उद्धृत्त’ है । करने से ‘उद्वृत्त’ है ।
४०५ ८ सर्पशीर्ष होते हैं तो । सर्पशीर्ष होते हैं ।
४०८ २७ तथा शब्द से भी रखता है तथा पताक शब्द से प्रधानता भी
रखता है ।
४१० १४ जिसका है सभी पश्चाद्भावी जिसका सभी पश्चाद्भावी
४१० ७ एक दूसरे से मिलती है । एक दूसरे से मिलते हैं ।
४११ ९ एक दूसरे से मिलती है । एक दूसरे से मिलते हैं ।
४१२ ७ से भी मण्डल बनाता है० से भी मण्डल बनता है०
४१
५५६ नाट्यशास्त्र
पृष्ठ पङ्क्ति अशुद्ध शुद्ध
४८१ ४ उदारता जैसे गुणों उदारता जैसे गुणों में उनकी
काव्योन्मुखी काव्योन्मुखी
४८१ ५ दस गुणों में कुछ अर्थगुण एवं दस गुणों में कुछ शब्दगुण, कुछ
कुछ उभयात्मक है। अर्थगुण एवं कुछ उभयात्मक हैं।
४८३ १० व्यापरे से उपसंक्रान्त व्यापार से उपसङ्क्रान्त
४८८ २८ विधाता ने सन्ध्यारूपी विधाता के द्वारा सन्ध्यारूपी
४९० १० यहाँ अवन्तर अर्थों के यहाँ अवान्तर अर्थों के
४९६ ९ चूर-चूर किये जाने भी चूर-चूर किये जाने पर भी
४९६ ११ अपने को रत्न के समान रत्न के समान
४९६ २० क्वाकार्यं शशलक्ष्मण क क्वा कार्यं शशलक्ष्मणः क
४९८ १५ कथामृतं हिमनिधा-- कथामृतं हिमनिधा—
४९८ २९ एवं स्वाभाविक कारण जहाँ एवं स्वाभाविक कारण से जहाँ
विद्यमान हो विद्यमान हो
५०३ ६ उपादान कर बतलाया उपादान कह कर बतलाया
५०७ ४ नाद छः प्रकार हो जाता है। नाद छः प्रकार का हो जाता है।
५०८ २५ 'प्राणवशेन में' 'प्राणवशेन' पद में
५०९ ४ अर्थयोगेन पद से का आशय अर्थयोगेन पद का आशय
५०९ १३ विरामाः इत्यादि से विरामाः' इत्यादि से
( काशी संस्कृत ग्रन्थमाला २१५ )
नाट्यशास्त्र ( प्रणेता-भरतमुनि )
हिन्दी प्रदीप व्याख्याकार—श्री बाबूलाल शुक्ल
साहित्य शास्त्र के आकर ग्रन्थ नाट्यशास्त्र का मूल प्रामाणिक पाठ, पाठान्तर,
टिप्पणी परिशिष्ट के साथ प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित यही सर्वाङ्गपूर्ण प्रामाणिक
संशोधपूर्ण संस्करण है । नाट्यशास्त्र के विशुद्ध पाठ के साथ व्यवस्थित पाठान्तरों
के संस्करण के वर्षों से होने वाले अभाव के कारण संशोधक विद्वानों तथा
अध्येतृवर्ग को बड़ी कठिनाई अनुभव हो रही थी तथा नाट्यशास्त्र के गम्भीर
एवं दुर्बोध आशय के कारण उसकी स्पष्ट व्याख्या की आवश्यकता चली आ
रही थी । इन्हीं अभावों को पूर्ण करने की भावना से प्रस्तुत संस्करण विशेष रूप
में प्रकाशित किया गया है । इसके प्रदीप नामक हिन्दी व्याख्यान तथा टिप्पणियों
में आचार्य अभिनव गुप्तपाद की प्रसिद्ध व्याख्या अभिनव भारती के समग्र
महत्त्वपूर्ण विवेचन को जहाँ एक ओर किया गया है वहीं अन्य अपेक्षित सामयिक
एवं उचित तथ्यों को भी समायोजित कर विवेचित किया गया है । प्रस्तावना में
विषय से सम्बद्ध सभी तथ्यों का विशद एवं संशोधनपूर्ण विवेचन किया गया है ।
विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर छात्रों के अतिरिक्त संशोधक एवं अभ्यासक जन
को इस ग्रन्थ के रखने पर अन्य नाट्यशास्त्र के किसी संस्करण की आवश्यकता
नहीं रहेगी । परीक्ष्य छात्रों को 'प्रदीप' व्याख्या के अनुसार अध्ययन करने पर
निश्चित सफलता मिलेगी । प्रथम भाग ( अध्याय १ से ७ अध्याय ) में करणों
के दुर्लभ रेखाचित्र तथा प्रेक्षा गृह का रेखाचित्र भी दिया गया है । अनेक विश्व-
विद्यालयों द्वारा स्वीकृत पाठ्य ग्रन्थ । प्रथम भाग-अध्याय १ से ७ २५-००
उपर्युक्त सभी विशेषताओं के साथ प्रदीप हिन्दी व्याख्यान के साथ अध्याय
८ से १९ तक का द्वितीय भाग ४०-००
प्राप्तिस्थान—चौखम्भा ओरियन्टालिया, वाराणसी-२२१००१
शाखा—बंगलो रोड, ६ यू० बी० जवाहर नगर, दिल्ली-११०००७