नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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४८१ ४ उदारता जैसे गुणों उदारता जैसे गुणों में उनकी
काव्योन्मुखी काव्योन्मुखी
४८१ ५ दस गुणों में कुछ अर्थगुण एवं दस गुणों में कुछ शब्दगुण, कुछ
कुछ उभयात्मक है। अर्थगुण एवं कुछ उभयात्मक हैं।
४८३ १० व्यापरे से उपसंक्रान्त व्यापार से उपसङ्क्रान्त
४८८ २८ विधाता ने सन्ध्यारूपी विधाता के द्वारा सन्ध्यारूपी
४९० १० यहाँ अवन्तर अर्थों के यहाँ अवान्तर अर्थों के
४९६ ९ चूर-चूर किये जाने भी चूर-चूर किये जाने पर भी
४९६ ११ अपने को रत्न के समान रत्न के समान
४९६ २० क्वाकार्यं शशलक्ष्मण क क्वा कार्यं शशलक्ष्मणः क
४९८ १५ कथामृतं हिमनिधा-- कथामृतं हिमनिधा—
४९८ २९ एवं स्वाभाविक कारण जहाँ एवं स्वाभाविक कारण से जहाँ
विद्यमान हो विद्यमान हो
५०३ ६ उपादान कर बतलाया उपादान कह कर बतलाया
५०७ ४ नाद छः प्रकार हो जाता है। नाद छः प्रकार का हो जाता है।
५०८ २५ 'प्राणवशेन में' 'प्राणवशेन' पद में
५०९ ४ अर्थयोगेन पद से का आशय अर्थयोगेन पद का आशय
५०९ १३ विरामाः इत्यादि से विरामाः' इत्यादि से