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नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 304 में से

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पृष्ठ 139

पर कौए के पंख से काले पैरों के चिह्न बना देने चाहिए। इस प्रकार बिन्दुओं से
चिह्नित उन हाथों का भली प्रकार निरीक्षण करना चाहिए।
यत्पुनर्न विभाव्येते दग्धावेतौ करौ तदा।
व्रीहीन् प्रगृह्य यत्नेन सप्त वारांस्तु मर्दयेत् ॥ 302 ॥
अग्नि दिव्य में उपर्युक्त क्रिया से काम न चलने पर अभियुक्त के दोनों हाथों
में अथवा दोनों में से एक दायें अथवा बायें हाथ के जलने न जलने के सम्बन्ध में
सन्देह अथवा विवाद उत्पन्न हो जाने पर शरद ऋतु में पके धान्य को अभियुक्त के
हाथों पर सात बार रगड़ना-मलना चाहिए। इससे वास्तविकता स्पष्ट रूप से उभर
कर सामने आ जायेगी।
मर्दितैर्यदि नो दग्धः सभ्यैरेवं विनिश्चितः।
मोच्यः स शुद्धः सत्कृत्य दग्धो दण्ड्यो यथाक्रमम् ॥ 303 ॥
अभियुक्त के हाथों पर धान्य के मर्दन के उपरान्त सभ्यों द्वारा हाथों के न जला
होने का निर्णय करना चाहिए और इसके विपरीत हाथ के दग्ध पाये जाने पर उसे
नियमानुसार दण्डित करना चाहिए।
अतः परं प्रवक्ष्यामि पानीयविधिमुत्तमम्।
हेमन्तकालादन्यत्र शिशिराच्च यथाक्रमम् ॥ 304 ॥
अग्नि दिव्य के वर्णन के उपरान्त अब हम जल दिव्य की विधि का परिचय
देंगे। यह जल दिव्य हेमन्त और शिशिर ऋतु में नहीं करना चाहिए! शेष ऋतुओं में
इसका प्रयोग उपयोग किया जा सकता है।
नदीषु नातिवेगासु सागरेषु वहेषु च।
ह्रदेषु देवखातेषु तडागेषु सरःसु च ॥ 305 ॥
जल दिव्य निम्नोक्त सभी प्रकार के जल-स्रोतों में किया जा सकता है, परन्तु
विचारणीय केवल यह है कि निर्वाचित जल-स्रोत का प्रवाह अतितीव्र न हो,
अर्थात् व्यक्ति जल के बीच ठहरने में असुविधा अनुभव न करे। ये जल-स्रोत हैं-
नदियां, सागर, नद (दरिया), हृद (कच्चे तालाब, जोहड़), बावलियां, झीलें,
सरोवर, प्रस्रवण तथा प्रपात (झरना) आदि।
नाति क्रूरेण धनुषा प्रेषयित्वा शरत्रयम्।
पानीयमज्जनं कार्यं कियच्च विपश्चितः ॥ 306 ॥
विद्वानों के अनुसार जल स्रोतों की गहराई ऊंचे क़द वाले व्यक्ति के चार
हाथों की लम्बाई से, मध्यम स्तर के लम्बे शरीर वाले व्यक्ति के पांच हाथों की
लम्बाई से और छोटे क़द-काठी व्यक्ति वाले के छह हाथों की लम्बाई से अधिक
नहीं होनी चाहिए। अधिक गहरे पानी में व्यक्ति का ठहर पाना सम्भव ही नहीं हो
पाता। वस्तुतः यह कहना चाहिए कि जल स्रोत की गहराई व्यक्ति की कमर
अथवा अधिक से अधिक सीने तक ही होनी चाहिए।
नारदस्मृति / 137