नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 138, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाहिए—ऐसा शास्त्रसम्मत निर्देश है। शास्त्र के अनुसार सहमे अभियुक्त द्वारा
अनुरोध न किये जाने पर उससे एक बार पुनः प्रयास करने की इच्छा अनिच्छा के
सम्बन्ध में पूछना चाहिए।
टिप्पणी—असहाय भाष्यकार के अनुसार—भय के कारण लौहपिण्ड के
अभियुक्त के हाथ से गिर जाने तथा हाथ के जलने न जलने के सम्बन्ध में
अनिश्चय होने पर अभियुक्त की जय पराजय को निर्णीत नहीं मान लेना चाहिए।
सन्देह की निवृत्ति के लिए उसे पुनः एक अवसर देना चाहिए—त्रासात्पातितदिव्ये
दग्धादग्धसंशये च न जयो नापराधः न पराजय इत्यर्थः। अतस्तं परं पुनर्द्दिव्यं
धारयेन्निःसंशयार्थमिति।
मण्डलस्य प्रमाणं तु कुर्यात्तत्पद सम्मितम्।
न मण्डलमत्तिक्रामेन्नाप्यर्वाक् स्थापयेत्पदम्॥ २९९॥
मण्डलों का क्षेत्रफल—लम्बाई, चौड़ाई (घेराव)—अभियुक्त के पैर की
चाल—एक पग कितना लम्बा रखता है—के अनुसार बनाना चाहिए। यदि इस
तथ्य की उपेक्षा करके घेरा (सर्कल) बनाया जाता है, तो अभियुक्त सभी मण्डलों
तक पहुंच नहीं पाता। उसके लिए सारे क्षेत्र को पार करना कठिन हो जाता है
अथवा यदि उसका पैर अधिक बड़ा है, तो एक साथ दो मण्डलों को घेर लेता है।
इस प्रकार अभियुक्त की गति क्षमता की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, अपितु उसके
आधार पर ही क्षेत्र के आकार का निर्धारण करना चाहिए।
टिप्पणी—स्मृतिचन्द्रिकाकार ने अग्नि दिव्य के सम्बन्ध में एक अन्य
सावधानी बरतने के प्रति सतर्क किया है। उसके अनुसार—तप्त लौहपिण्ड को
हाथों में लेने वाले अभियुक्त के दोनों हाथों की भली प्रकार परीक्षा करते हुए यह
देखना चाहिए कि उन हाथों में कोई घाव तो नहीं है अथवा कोई गुप्त चर्मरोग तो
नहीं है अथवा उसने अग्नि की दाहकता से बचने के लिए कोई औषध तो नहीं लगा
रखी है।
लक्षयेत्तस्य चिह्नानि हस्तयोरुभयोरपि।
प्राकृतानि च गूढानि सव्रणान्यव्रतानि च॥
अनेन विधिना कार्यो हुताशः समयः सदा।
ऋते ग्रीष्मात् सदा युक्तः कालेऽन्यत्र सुशीतले॥ ३००॥
ग्रीष्म ऋतु और शीत ऋतु को छोड़कर शेष ऋतुओं—हेमन्त, शिशिर, वसन्त
और वर्षा—में उपर्युक्त विधि से अग्नि दिव्य किया जाता है।
हस्तक्षतेषु सर्वेषु कुर्यात् काकपदानि च।
तान्येव पुनरवेक्षेद्व्रस्तौ बिन्दुविचित्रितौ॥ ३०१॥
अग्नि दिव्य करने वाले अभियुक्त के हाथों के क्षत-विक्षत हो जाने पर व्रणों
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