प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
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६—सख्यासक्त भक्त—अर्जुन, उद्धव, संजय, श्रीदाम,
सुदामादि।
७—कान्तासक्त भक्त—अष्ट पटरानियाँ आदि।
८—वात्सल्यासक्त भक्त—कश्यप-अदिति, सुतपा-पृश्नि,
मनु-शतरूपा, दशरथ-कौसल्या, नन्द-यशोदा, वसुदेव-देवकी आदि।
९—आत्मनिवेदनासक्त भक्त—श्रीहनुमान्जी, राजा अम्बरीष,
राजा बलि, विभीषणजी, शिबि आदि।
१०—तन्मयतासक्त भक्त—याज्ञवल्क्य, शुक, सनकादि
ज्ञानीगण अथवा कौण्डिन्य, सुतीक्ष्ण आदि प्रेमी मुनिगण।
११—परमविरहासक्त भक्त—उद्धव, अर्जुन, व्रजके नर-
नारी।
श्रीगोपीजनोंमें ग्यारहों प्रकारके प्रेमका विकास था। परन्तु
उपर्युक्त भक्तोंमें एक-एक प्रकारके ही प्रेमका विकास था सो
बात नहीं है। जिस भावकी प्रधानता थी उसीमें उनका नाम लिख
दिया गया है।
इत्येवं वदन्ति जनजल्पनिर्भया एकमताः कुमारव्यासशुक-
शाण्डिल्यगर्गविष्णुकौण्डिन्यशेषोद्धवारुणिबलिहनुमद्विभीषणादयो
भक्त्याचार्याः ॥ ८३ ॥
८३-कुमार (सनत्कुमारादि), वेदव्यास, शुकदेव, शाण्डिल्य,
गर्ग, विष्णु, कौण्डिन्य, शेष, उद्धव, आरुणि, बलि, हनूमान्,
विभीषण आदि भक्तितत्त्वके आचार्यगण लोगोंकी निन्दा-
स्तुतिका कुछ भी भय न कर (सब) एकमतसे ऐसा ही कहते
हैं (कि भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है)।
देवर्षि नारद भक्तितत्त्वके प्रधान-प्रधान आचार्योंका मत
देकर अपने कथनकी पुष्टि करते हैं। ये सभी महापुरुष