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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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पृष्ठ 137

प्रेमी भक्तोंकी महिमा १३५
यतस्तदीयाः ॥ ७३ ॥
७३-क्योंकि (भक्त सब ) उनके ( भगवान्‌के ) ही हैं।
भक्त अपनी भक्तिके प्रभावसे भगवद्रूप ही हो जाते हैं,
इसीलिये उनमें परस्पर भेदबुद्धि नहीं होती और उनमें कोई
अपनेको किसी भी हेतुसे ऊँचा नहीं समझता।
□ □
पीठ देकर बैठना, २४-भगवान्‌की मूर्तिके सामने जूते पहनकर जाना, २५-भगवान्‌की
मूर्तिके सामने माला धारण करना, २६-भगवान्‌की मूर्तिके सामने छड़ी लेकर जाना,
२७-भगवान्‌की मूर्तिके सामने नीले कपड़े पहनकर जाना, २८-दाँतुन-कुल्ला किये बिना
जाना, २९-मलत्याग या मैथुनादिके बाद कपड़े बदले बिना मन्दिरमें प्रवेश करना,
३०-भगवान्‌की मूर्तिके सामने हाथ-पैर फैलाना, ३१-भगवान्‌की मूर्तिके सामने पान
खाना, ३२-भगवान्‌की मूर्तिके सामने जोरसे हँसना, ३३-कुचेष्टा करना, ३४-स्त्रियोंके
चारों ओर घूमना, ३५-क्रोध करना, ३६-भगवान्‌की मूर्तिके सामने किसी दूसरेका
अभिवादन करना, ३७-दुर्गन्धवाली कोई चीज खाकर दुर्गन्ध दूर हुए पहले मन्दिरमें जाना,
३८-मादक द्रव्य सेवन करना, ३९-किसीको अपमानित करना या मारना, ४०-काम-
क्रोधादिकी चेष्टा करना, ४१-अतिथि या साधुकी आवभगत न करना, ४२-अपनेको
भक्त, धर्मात्मा, पण्डित या पुण्यवान् समझना, ४३-नास्तिक, व्यभिचारी, हिंसक, लोभी
और झूठ बोलनेवाले मनुष्योंका संग करना, ४४-विपत्तिमें ईश्वरपर दोष लगाना, ४५-
पापके लिये धर्म करना, ४६-किसीको किंचित् भी कष्ट देकर अपनेको धार्मिक
समझना, ४७-स्त्री, पुत्र, परिवार, आश्रित, दीन और साधुका पालन-पोषण न करना,
४८-किसी वस्तुको अपनी भोग्य समझकर भगवान्‌के निवेदन करना या बिना निवेदन
किये भोगना, ४९-अपने इष्टदेवके नामकी शपथ करना, ५०-धर्म और भगवान्‌के
नामको बेचकर धन कमाना, ५१-अपने इष्टदेवको छोड़कर दूसरेसे आशा करना,
५२-शास्त्रोंकी मर्यादाको तोड़ना, ५३-ब्रह्मज्ञान न होनेपर भी ब्रह्मज्ञानीके समान आचरण
करना, ५४-सम्प्रदायभेदसे वैष्णवोंमें किसीको ऊँचा-नीचा समझना, ५५-देवताके
समान आचरण करना, ५६-अवतारोंकी लीलाओंमें तारतम्य देकर उनकी निन्दा
करना, ५७-दिल्लगीमें भी किसीको 'आप ही भगवान् हैं' ऐसा कहना, ५८-भगवान्
किसीके मुखापेक्षी हैं, भूलकर भी ऐसा समझना, ५९-लोभवश किसीको भगवत्प्रसाद
या चरणोदक देना, ६०-भगवान्‌के चित्र, प्रतिमा या नामका अपमान करना, ६१-
किसी भी जीवको किसी प्रकारसे कष्ट पहुँचाना, भय दिखलाना या किसीका अहित
करना, ६२-तर्क-वितर्कमें हार जाने या सिद्धान्त स्थापित न कर सकनेपर आस्तिकताको
त्याग देना, ६३-भगवान्‌के अवतारोंके जन्म-कर्मोंको साधारण समझना, ६४-
भगवान्‌के युगलरूपमें द्वैतबुद्धि करना।