सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 226 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 183

सर्गः ३ ] जीवातु-मदयन्तिकासहितम् । १६७
प्रणवपूर्वकत्वादिति भावः । यथा निशायाः निशाकरेतरप्रतिग्रहो न शङ्कनीयः, तथा
ममापि नलेतरप्रतिग्रहो न शङ्कनीय इत्यर्थः । रूपकालङ्कारः ॥ ७५ ॥
नल के अतिरिक्त किसी अन्य के साथ (मेरे पिता द्वारा) कन्यादान होने के
सम्बन्ध में यदि यह ('पितृनियोगेन' वाली) धारणा तुम्हारे हृदय में, वेद के
समान बद्धमूल जमी हुई है, तो तुम रात्रि का भी चन्द्रमा के अतिरिक्त कोई अन्य
पति होने की शङ्का को इस प्रकार स्थान दो, जिस प्रकार वेदमन्त्र के पहले ॐ
होता है । (अर्थात् जिस प्रकार वेदमन्त्र के पूर्व ओम् का उच्चारण किया जाता
है, उसी प्रकार चन्द्रमा के अतिरिक्त निशा-नायिका के अन्य पति होने की कल्पना

  • नल के अतिरिक्त मेरे अन्य पति होने की कल्पना के समान - करनी
    चाहिए) ॥ ७५ ॥
    सरोजिनी-मानस-राग-वृत्तेरनर्क-सम्पर्कमतर्कयित्वा ।
    मदन्य-पाणिग्रह-शङ्कितेयमहो महीयस्तव साहसिक्यम् ॥ ७६॥
    सरोजिनीति । [ सरोजिनी-मानस-राग-वृत्तेः ] सरोजिन्याः पद्मिन्याः,
    मानसरागवृत्तेर्मनोऽनुरागस्थितेः, अभ्यन्तरारुण्यप्रवृत्तेश्च; अनर्कसम्पर्कम् = अर्के-
    तरकान्तसंक्रान्तिम् अतर्कयित्वा = अनूहयित्वा, तव, इयं [ मदन्यपाणिग्रह-
    शङ्किता ] मम अन्यस्य नलेतरस्य, पाणिग्रहं शङ्कत इति तच्छङ्कितस्य भाव-
    स्तत्ता । महीयः = महत्तरं साहसिक्यं = साहसिकत्वं, अहो असम्भावितसम्भाव-
    नादाश्चर्यम् ॥ ७६ ॥
    कमलिनी के चित्त के अनुराग की वृत्ति की--सूर्य के अतिरिक्त किसी अन्य
    के साथ तुमने--तर्कना तो नहीं की; पर, मेरे सम्बन्ध में तुम्हारी-नल के अति-
    रिक्त किसी अन्य युवक के साथ पाणिग्रहण होने की-यह शङ्का बनी हुई है।
    तुम्हारा यह साहस बड़ा गुरुतर है, यह बड़े आश्चर्य की बात है ! ॥७६॥
    साधु त्वयाऽतर्कि तदेकमेव स्वेनानलं यत्किल संश्रयिष्ये ।
    विनामुना स्वात्मनि तु प्रहर्तुं मृषा गिरं त्वां नृपतौ न कर्तुम् ॥७७॥
    साध्विति । किं च स्वेन = स्वेच्छया, अनलं=नलमन्यं अग्निं च, संश्रयिष्ये
    = प्राप्स्यामीति किल यत् त्वया अतर्कि ऊहितं, तदेकमेव साधु भतर्कि । किं
    तु, अमुना=नलेन बिना, तदलाभ इत्यर्थः । स्वात्मनि प्रहर्तुं =स्वात्मानं हिंसितुम् ।
    कर्मणो अधिकरणत्वविवक्षायां सप्तमी । अनेकशक्तियुक्तस्य विश्वस्यानेककर्मणः ।