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सर्वकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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पृष्ठ 175

सर्गः ३ ] जीवातु-मदयन्तिकासहितम् १५९
वाचं तदीयां परिपीय मृद्वीं मृद्वीकया तुल्यरसां स हंसः ।
तत्याज तोषं परपुष्टघुष्टे घृणाञ्च वीणाक्वणिते वितेने ॥६०॥
वाचमिति । स हंसः मृद्वीकया=द्राक्षया । 'मृद्वीका गोस्तनी द्राक्षा'इत्यमरः ।
तुल्यरसां = समानस्वादां, मधुरार्थामित्यर्थः । मृद्वीं = मधुराक्षरां, तदीयां वाचं
परिपीय = अत्यादरादाकर्ण्य, परपुष्टघुष्टे = कोकिलकूजिते तोषं = प्रीतिं तत्याज ।
वीणाक्वणिते च घृणां=जुगुप्साम् । 'घृणा जुगुप्सा-कृपयोः' इति विश्वः । वितेने ॥
दमयन्ती की—अंगूर के समान मीठी रसदार ( माधुर्य रस से परिपूर्ण )—
कोमल वाणी का सादर पान करके, उस हंस को कोयल की ( मीठी ) कूक का
आनन्द जाता रहा और वीणा की कुन-कुन की ( मधुर तथा सुरीली ) आवाज़
से भी घृणा हो गयी ( अर्थात् वीणा की झङ्कार तथा कोयल की बोली से भी बढ़
कर, दमयन्ती की वाणी तथा कण्ठध्वनि में मधुरता थी ) ॥६०॥
मन्दाक्ष-मन्दाक्षर-मुद्रमुक्तवा तस्यां समाकुञ्चितवाचि हंसः ।
तच्छंसिते किञ्चन संशयालुर्गीरा मुखाम्भोजमयं युयोज ॥६१॥
मन्दाक्षमिति । तस्यां = भैम्यां, [ मन्दाक्ष-मन्दाक्षर-मुद्रं ] मन्दाक्षेण
हिया, मन्दा सन्दिग्धार्था, अक्षरमुद्रा द्विजराजपाणिग्रहेत्याद्यक्षरविन्यासो यस्मिन्
तत्तथोक्तम् उक्त्वा समाकुञ्चितवाचि = नियमितवचनायां सत्याम् अयं हंसः,
तच्छंसिते = भैमीभाषिते किञ्चन = किञ्चित् संशयालुः = सन्दिहानः सन् ।
'स्पृहिगृहि' इत्यादिना आलुच् प्रत्ययः । मुखाम्भोज = मुखकमलं, गिरा युयोज
=मुखेन गिरमुवाचेत्यर्थः ॥६१॥
दमयन्ती के--लज्जा के कारण अल्प अक्षर ( 'द्विजराज-पाणि-ग्रहाभिलाषं०' )
के विन्यास से—वैसा ( 'मन जिसे चाहता है' ) कहकर 'वाणी' के मौन धारण
कर लेने पर, वह हंस, उसकी कही हुई ( 'मन जिसे चाहता है'—इस ) बात
पर, कुछ संशयालु हुआ ( कि वह नल को चाहती है क्या ? ) । तब इस संशय
को निवारण करने के लिए ) आगे कही जानेवाली 'वाणी' के साथ, उसने अपने
मुख-'कमल' का, संयोग कराया ( अर्थात् प्रश्न किया ) ॥ ६१ ॥
करेण वाञ्छेव विधुं विधातुं यमित्थमात्थादरिणी तमर्थम् ।
पातुं श्रुतिभ्यामपि नाधिकुर्वे वर्णं श्रुतेर्वर्ण इवान्तिमः किम् ॥६२॥
करेणेति । हे भैमि !, करेण विधुं = चन्द्रं, विधातुं = ग्रहीतुं, वाञ्छा इव