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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

भृत्य, वामन, वैदेशिक आदि करते हैं; यथा अभिज्ञानशाकुन्तल
में दोनों रक्षी तथा धीवर की भाषा मागधी ही है ।
प्राकृत साहित्य का एक विशेष भाग प्राकृत व्याकरण हैं।
भारतीय नाट्य शास्त्र सब से पुराना प्रमाण है । प्राचीनतम
प्राकृत व्याकरण जो हस्तगत हुआ है वह वररुचि कात्यायन का
'प्राकृत प्रकाश' है, परन्तु इस विषय का सब से श्रेष्ठ निरूपण
जैन-आचार्य हेमचन्द्र (१०८८-११७२) ने अपने व्याकरण
"सिद्ध हेम-चन्द्र" के आठवें अध्याय में किया है ।
संस्कृत से प्राकृत और प्राकृत से संस्कृत बनाने की रीति
जानने के लिए प्राकृत की विशेषताएँ जानना बहुत आवश्यक
है । आगे हम यही विशेषताएँ देते हैं: —
१. द्विवचनस्य बहुवचनम्ः — प्राकृत में दो ही वचन होते हैं:-
एक वचन और बहु वचन । इस में द्विवचन नहीं होता ।
द्विवचन के स्थान पर बहुवचन ही कर दिया जाता है ।
२. चतुर्थ्याः षष्ठी — प्राकृत में चतुर्थी के स्थान में षष्ठी होती
है ।
३. प्राकृत में आत्मनेपद नहीं होता । प्रत्येक धातु परस्मैपद में
होती है ।
४. प्राकृत में निम्न लिखित स्वर होते ही नहीं: —
ऋ; ॠ; ऌ; ॡ; ऐ; औ; अः ।
(i) संस्कृत के 'ऋ' के स्थान में अगले वर्ण का स्वर आ
जाता है:— तृण से तण; ऋषि से इसि इत्यादि ।
अपवाद — वृद्ध से वुढ्ढ और ऋण से रिण ।

( २४३ )
(ii) ‘लृ’ को ‘इलि’ हो जाता है जैसे: —क्लृप्त से किलित्त।
(iii) ऐ; औ के स्थान में क्रमशः ए, ओ आते हैं:—
शैल से सेल; औरस से ओरस; सौम्य से सोम्य ।
ऐ को अ + इ और औ को अ + उ भी होता है: — दैव
से दइव; दैत्य से दइच्च; भैरव से भइरव; कौरव से कउरव
इत्यादि ।
५. 'नो णः सर्वत्र' । प्राकृत में सब स्थान पर न को ण होता-
है:— नदी से णई इत्यादि ।
६. 'शषयोः स'— श् तथा ष् के स्थान में स् हो जाता है:—निशा
से णिसा; कषाय से कसाय ।
७. "आदेर्यो जः"—संस्कृत में जिन शब्दों के आदि में य् होता है
प्राकृत में य् के स्थान पर ज् होता है:— यशः से जसो; यदि
से जइ; यज्ञ से जक्खो । अपवाद— यष्टि से लट्ठी ।
८. परन्तु यदि 'य्' आदि में न होकर मध्य अथवा अन्त में हो तो
इसके स्थान में 'अ' हो जाता है:— जय से जअ ।
९. "मो बिन्दु"ः— पदान्त 'म्' को अनुस्वार हो जाता है:—
भद्रम् से भद्दं ।
१०. अकारान्त— शब्द के अन्त में यदि विसर्ग आए तो उस विसर्ग
को 'उ' हो जाता है। यह 'उ' पहिले 'अ' से मिलकर 'ओ' हो
जाता है :—
पुरुषः से पुरिसो ।

( २८४ )
११. “अन्ते हल्”— पदान्त में हलन्त का लोप हो जाता है :—
देवात् से देवा; जगत् से जग; मनस् से मन इत्यादि ।
१२. “पो वः”— पदान्त अथवा पद के बीच के प् को व् हो
जाता है :— शापः से सावो ।
१३. “टो डः”; “ठो ढः”— ट् और ठ् को क्रमशः ड् और ढ्
हो जाता है ;— नटः से णडो; पठ से पढ ।
१४. “डस्य लः”— ड् को ल् हो जाता है :—तडागः से तलाओ ।
१५. यदि क्, ग्, च्, ज्, त्, द्, प्, य्, और व् आरम्भ में न
हों तो प्रायः इन का लोप हो जाता है:— लोकः से लोओ;
सागरम् से साअरं; वातः से वाओ; कपि से कइ; जीव से जीअ;
वायु से वाउ; नयन से णअण इत्यादि ।
१६. यदि ख्, घ्, थ्, ध् और भ् आरम्भ में न हों तो इन के
स्थान में ‘ह्’ आ जाता है:—
मुखम् से मुहं; मेघ से मेह; गाथा से गाहा; नभसः से णहसो ।
१७. (क) “उपरिलोपः—क्, ग्, ड्, त्, द्, प्, ष्,
सां”— संयुक्त अक्षरों में इन व्यंजनों में से कोई आदि में हो
तो उस का लोप हो जाता है और आगे के वर्ण को द्वित्व हो
जाता है:— भक्त से भत्त; अद्य से अज्ज; स्निग्ध से सिणिद्ध;
उत्पल से उप्पल; मुद्गर से मुग्गर; सुप्त से सुत्त; हस्त से हत्थ ।
(ख) “अधो मनयां”:—संयुक्त अक्षरों में म्, न्, य् में
से कोई अन्तिम हो तो इनका लोप हो जाता है और पहिले
व्यंजन को द्वित्व हो जाता है:—
युग्म से जुग्ग; विघ्न से विग्ध; योग्य से जोग्ग ।

( २८५ )
(ग) “सर्वत्र ल्वरां” :—संयुक्त अक्षर में ल्, व्, र् का
सदा लोप हो जाता है और दूसरे अक्षर को (चाहे वह पहिले
ही या पीछे) द्वित्व हो जाता है :—
विप्लव से विक्कव; उज्ज्वल से उज्ज्ल ।
१८. 'त्य', 'थ्य' तथा 'द्य' के स्थान में क्रमशः च्च, छ् अथवा च्छ;
और ज्ज हो जाता है. – नित्य से णिच्च; सत्य से सच्च; वैद्य से
वेज्ज
१९. ध्य और ह्य के स्थान में ज्झ हो जाता है । अध्ययन से
अज्झयण इत्यादि ।

( २८५ )
(ग) "सर्वत्र लवरां" :— संयुक्त अक्षर में ल्, व्, र् का
सदा लोप हो जाता है और दूसरे अक्षर को (चाहे वह पहिले
ही या पीछे) द्वित्व हो जाता है :—
विप्लव से विक्कव, उज्ज्वल से उज्जल ।
१८. 'त्य' 'ध्य' तथा 'द्य' के स्थान में क्रमशः च्च, छ् अथवा च्छ;
और ज्ज हो जाता है — नित्य से णिच्च; सत्य से सच्च; वैद्य से
वेज्ज
१६. ध्य और ह्य के स्थान मे ज्झ हो जाता है। अध्ययन से
अज्झअण इत्यादि ।