मुण्डकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Mundaka Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ, निवेदन व विषय-सूची
ॐ
मुण्डकोपनिषद्
सानुवाद शाङ्करभाष्यसहित
प्रकाशक—
गीताप्रेस, गोरखपुर
मुद्रक तथा प्रकाशक
घनश्यामदास जालान
गीताप्रेस, गोरखपुर
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सं० १९९२
प्रथम संस्करण
३२५०
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<p align="right"><b>मूल्य ।=) सात आना</b></p>निवेदन
मुण्डकोपनिषद् अथर्ववेदके मन्त्रभागके अन्तर्गत है। इसमें तीन मुण्डक हैं और एक-एक मुण्डकके दो-दो खण्ड हैं। ग्रन्थके आरम्भमें ग्रन्थोक्त विद्याकी आचार्यपरम्परा दी गयी है। वहाँ बतलाया है कि यह विद्या ब्रह्माजीसे अथर्वाको प्राप्त हुई और अथर्वासे क्रमशः अङ्गी और भारद्वाजके द्वारा अङ्गिराको प्राप्त हुई। उन अङ्गिरा मुनिके पास महागृहस्थ शौनक ने विधिवत् आकर पूछा कि 'भगवन् ! ऐसी कौन-सी वस्तु है जिस एकके जान लेनेपर सब कुछ जान लिया जाता है?' महर्षि शौनकका यह प्रश्न प्राणिमात्रके लिये बड़ा कुतूहलजनक है, क्योंकि सभी जीव अधिक-से-अधिक वस्तुओंका ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं।
इसके उत्तरमें महर्षि अङ्गिराने परा और अपरा नामक दो विद्याओंका निरूपण किया है। जिसके द्वारा ऐहिक और आमुष्मिक अनात्म पदार्थोंका ज्ञान होता है उसे अपरा विद्या कहा है, तथा जिससे अखण्ड, अविनाशी एवं निष्प्रपञ्च परमार्थतत्त्वका बोध होता है उसे परा विद्या कहा गया है। सारा संसार अपरा विद्याका विषय है तथा संसारी पुरुषोंकी प्रवृत्ति भी उसीकी ओर है। उसीके द्वारा ऐसे किसी एक ही अखण्ड तत्त्वका ज्ञान नहीं हो सकता जो सम्पूर्ण ज्ञानोंका अधिष्ठान हो, क्योंकि उसके विषयभूत जितने पदार्थ हैं वे सब-के-सब परिच्छिन्न ही हैं। अपरा विद्या वस्तुतः अविद्या ही है; व्यवहारमें उपयोगी होनेके कारण ही उसे विद्या कहा जाता है। अखण्ड और अव्यय तत्त्वके जिज्ञासुके लिये वह त्याज्य ही है। इसीलिये आचार्य अङ्गिराने यहाँ उसका उल्लेख किया है।
इस प्रकार विद्याके दो भेद कर फिर सम्पूर्ण ग्रन्थमें उन्हींका सविस्तर वर्णन किया गया है। ग्रन्थका पूर्वार्ध प्रधानतया अपरा विद्याका
( २ )
निरूपण करता है और उत्तरार्धमें मुख्यतया परा विद्या और उसकी प्राप्तिके साधनोंका विवेचन है। इस उपनिषद्की वर्णनशैली बड़ी ही उदात्त एवं हृदयहारिणी है, जिससे स्वभावतः ही जिज्ञासुओंका हृदय इसकी ओर आकर्षित हो जाता है।
उपनिषदोंका जो प्रचलित क्रम है उसके अनुसार इसका अध्ययन प्रश्नोपनिषद्के पश्चात् किया जाता है। परन्तु प्रस्तुत पुस्तकके पृष्ठ ९४ पर भगवान् शङ्कराचार्य लिखते हैं—'वक्ष्यति च 'न येषु जिह्ममनृतं न माया च' इति' अर्थात् 'जैसा कि आगे (प्रश्नोपनिषद्में) 'जिन पुरुषोंमें अकुटिलता, अनृत और माया नहीं है' इत्यादि वाक्यद्वारा कहेंगे भी।' इस प्रकार प्रश्नोपनिषद्के प्रथम प्रश्नके अन्तिम मन्त्रका भविष्यत्कालिक उल्लेख करके आचार्य सूचित करते हैं कि पहले मुण्डकका अध्ययन करना चाहिये और उसके पश्चात् प्रश्नका। प्रश्नोपनिषद्का भाष्य आरम्भ करते हुए तो उन्होंने इसका स्पष्टतया उल्लेख किया है। अतः शाङ्करसम्प्रदायके वेदान्तविद्यार्थियोंको उपनिषद्भाष्यका इसी क्रमसे अध्ययन करना चाहिये। अस्तु, भगवान्से प्रार्थना है कि इस ग्रन्थके अनुशीलनद्वारा हमें ऐसी योग्यता प्रदान करें जिससे हम उनके सर्वाधिष्ठानभूत परात्पर स्वरूपका रहस्य हृदयङ्गम कर सकें।
अनुवादक
श्रीहरिः
विषय-सूची
| विषय | पृष्ठ | ||
|---|---|---|---|
| १. शान्तिपाठ | ... | ... | १ |
प्रथम मुण्डक
प्रथम खण्ड
| विषय | पृष्ठ | ||
|---|---|---|---|
| २. सम्बन्धभाष्य | ... | ... | २ |
| ३. आचार्यपरम्परा | ... | ... | ५ |
| ४. शौनककी गुरूपसत्ति और प्रश्न | ... | ... | ८ |
| ५. अङ्गिराका उत्तर—विद्या दो प्रकारकी है | ... | ... | ११ |
| ६. परा और अपरा विद्याका स्वरूप | ... | ... | १२ |
| ७. परविद्याप्रदर्शन | ... | ... | १५ |
| ८. अक्षरब्रह्मका विश्वकारणत्व | ... | ... | १८ |
| ९. सृष्टिक्रम | ... | ... | १९ |
| १०. प्रकरणका उपसंहार | ... | ... | २१ |
द्वितीय खण्ड
| विषय | पृष्ठ | ||
|---|---|---|---|
| ११. कर्मनिरूपण | ... | ... | २३ |
| १२. अग्निहोत्रका वर्णन | ... | ... | २६ |
| १३. विधिहीन कर्मका कुफल | ... | ... | २७ |
| १४. अग्निकी सात जिह्वाएँ | ... | ... | २९ |
| १५. विधिवत् अग्निहोत्रादिसे स्वर्गप्राप्ति | ... | ... | ३० |
| १६. ज्ञानरहित कर्मकी निन्दा | ... | ... | ३२ |
| १७. अविद्याग्रस्त कर्मठोंकी दुर्दशा | ... | ... | ३४ |
| १८. ऐहिक और पारलौकिक भोगोंकी असारता देखनेवाले पुरुषके लिये संन्यास और गुरूपसदनका विधान | ... | ... | ३९ |
| १९. गुरुके लिये उपदेशप्रदानकी विधि | ... | ... | ४२ |
( २ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| द्वितीय मुण्डक | |
| प्रथम खण्ड | |
| २०. अग्निसे स्फुलिङ्गोंके समान ब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति | ... ... ४४ |
| २१. ब्रह्मका पारमार्थिक स्वरूप | ... ... ४६ |
| २२. ब्रह्मका सर्वकारणत्व | ... ... ५० |
| २३. सर्वभूतान्तरात्मा ब्रह्मका विश्वरूप | ... ... ५२ |
| २४. अक्षर पुरुषसे चराचरकी उत्पत्तिका क्रम | ... ... ५४ |
| २५. कर्म और उनके साधन भी पुरुषप्रसूत ही हैं | ... ... ५५ |
| २६. इन्द्रिय, विषय और इन्द्रियस्थानादि भी ब्रह्मजनित ही हैं | ... ... ५७ |
| २७. पर्वत, नदी और ओषधि आदिका ब्रह्मजन्यत्व | ... ... ५९ |
| २८. ब्रह्म और जगत्का अभेद तथा ब्रह्मज्ञानसे अविद्या-ग्रन्थिका नाश | ... ... ६० |
| द्वितीय खण्ड | |
| २९. ब्रह्मका स्वरूपनिर्देश तथा उसे जाननेके लिये आदेश | ... ... ६२ |
| ३०. ब्रह्ममें मनोनिवेश करनेका विधान | ... ... ६४ |
| ३१. ब्रह्मवेधनकी विधि | ... ... ६६ |
| ३२. वेधनके लिये ग्रहण किये जानेवाले धनुषादिका स्पष्टीकरण | ... ... ६७ |
| ३३. आत्मसाक्षात्कारके लिये पुनः विधि | ... ... ६९ |
| ३४. ओंकाररूपसे ब्रह्मचिन्तनकी विधि | ... ... ७० |
| ३५. अपर ब्रह्मका वर्णन तथा उसके चिन्तनका प्रकार | ... ... ७२ |
| ३६. ब्रह्मसाक्षात्कारका फल | ... ... ७५ |
| ३७. ज्योतिर्मय ब्रह्म | ... ... ७६ |
| ३८. ब्रह्मका सर्वप्रकाशकत्व | ... ... ७८ |
| ३९. ब्रह्मका सर्वव्यापकत्व | ... ... ८० |
| तृतीय मुण्डक | |
| प्रथम खण्ड | |
| ४०. प्रकारान्तरसे ब्रह्मनिरूपण | ... ... ८२ |
| ४१. समान वृक्षपर रहनेवाले दो पक्षी | ... ... ८३ |
( ३ )
| विषय | पृष्ठ | ||
|---|---|---|---|
| ४२. ईश्वरदर्शनसे जीवकी शोकनिवृत्ति | ... | ... | ८५ |
| ४३. श्रेष्ठतम ब्रह्मज्ञ | ... | ... | ८८ |
| ४४. आत्मदर्शनके साधन | ... | ... | ९२ |
| ४५. सत्यकी महिमा | ... | ... | ९४ |
| ४६. परमपदका स्वरूप | ... | ... | ९६ |
| ४७. आत्मसाक्षात्कारका असाधारण साधन—चित्तशुद्धि | ... | ९८ | |
| ४८. शरीरमें इन्द्रियरूपसे अनुप्रविष्ट हुए आत्माका चित्तशुद्धिद्वारा साक्षात्कार | ... | ... | १०० |
| ४९. आत्मज्ञका वैभव और उसकी पूजाका विधान | ... | १०१ |
द्वितीय खण्ड
५०. आत्मवेत्ताकी पूजाका फल | ... | ... | १०३
५१. निष्कामतासे पुनर्जन्मनिवृत्ति | ... | ... | १०४
५२. आत्मदर्शनका प्रधान साधन—जिज्ञासा | ... | ... | १०६
५३. आत्मदर्शनके अन्य साधन | ... | ... | १०७
५४. आत्मदर्शीकी ब्रह्मप्राप्तिका प्रकार | ... | ... | १०९
५५. ज्ञातज्ञेयकी मोक्षप्राप्ति | ... | ... | ११०
५६. मोक्षका स्वरूप | ... | ... | ११३
५७. ब्रह्मप्राप्तिमें नदी आदिका दृष्टान्त | ... | ... | ११५
५८. ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही है | ... | ... | ११५
५९. विद्याप्रदानकी विधि | ... | ... | ११७
६०. उपसंहार | ... | ... | ११९
६१. शान्तिपाठः | ... | ... | १२१
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अङ्गिरस और शौनकका संवाद